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तेरहवाँ सर्ग।

प्रधान कारण अव्यक्त बतलाते हैं उसी तरह बड़े बड़े विज्ञानी मुनि इस नदी का आदि-कारण—इसका उद्गम-स्थान—ब्रह्मसरोवर बतलाते हैं—वह ब्रह्मसरोवर जिसमें खिले हुए सुवर्ण-कमलों की रज, स्नान करते समय, यक्षों की स्त्रियों की छाती में लग लग जाती है। इसके किनारे किनारे यज्ञों के न मालूम कितने यूप-नामक खम्भे गड़े हुए हैं। अश्वमेध-यज्ञ समाप्त होने पर, अवभृथ-नामक स्नान कर के, इक्ष्वाकुवंशी राजाओं ने इसके जल को और भी अधिक पवित्र कर दिया है। ऐसी पुण्यतोया यह सरयू अयोध्या-राजधानी के पासही बहती है। इसकी बालुकापूर्ण-तटरूपी गोद में सुख से खेलने और दुग्धवत् जल पीकर बड़े होने वाले उत्तर-कोसल के राजाओं की यह धाय के समान है। इसी से मैं इसे बड़े आदर की दृष्टि से देखता हूँ। मेरे माननीय पिता के वियोग को प्राप्त हुई मेरी माता के समान यह सरयू, चौदह वर्ष तक दूर देश में रहने के अनन्तर मुझे अयोध्या को आते देख, वायु को शीतलता देने वाले अपने तरङ्गरूपी हाथों से मेरा आलिङ्गन सा कर रही है।

"सन्ध्या के समान लालिमा लिये हुए धूल सामने उड़ती दिखाई दे रही है। जान पड़ता है, हनूमान् से मेरे आगमन का समाचार सुन कर, सेना को साथ लिये हुए भरत, आगे बढ़ कर, मुझसे मिलने आ रहे हैं। वे पूरे साधु हैं। अतएव, मुझे विश्वास है कि प्रतिज्ञा का पालन करके लौटे हुए मुझे वे निज-रक्षित राजलक्ष्मी को उसी तरह अछूती सौंप देंगे जिस तरह कि युद्ध में खर-दूषण आदि को मार कर लोटे हुए मुझे लक्ष्मण ने तुझे सौंपा था।

"मेरा विचार सच निकला। छाल के कपड़े पहने और अर्घ्य हाथ में लिये हुए, बूढ़े बूढ़े मन्त्रियों के साथ, भरत मुझसे मिलने के लिए पैदल आ रहे हैं। गुरु वशिष्ठ तो उनके आगे हैं और सेना पीछे। भरत की मुझ पर अपूर्व भक्ति है। पिता ने राजलक्ष्मी को उनकी गोद में दे दिया। परन्तु भरत ने, युवा होकर भी, उसे हाथ न लगाया। मुझ में अत्यधिक श्रद्धा रखने के कारण उसे उन्होंने चौदह वर्ष तक वैसी ही अनभोगी रक्खा। पास पास रहने पर भी यदि युवक और युवती के मन में विकार न उत्पन्न हो तो वह असिधार-व्रत कहलाता है। तलवार की धार पर चलने के समान इस व्रत को साध ले जाना बड़ाही कठिन काम है। भरत ने इतने वर्ष तक लक्ष्मी को अनभोगी रख कर इसी महा-कठिन व्रत की साधना की है। अतएव उनके निर्म्मल चरित्र की जितनी प्रशंसा की जाय कम है"।