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रघुवंश।

भिराम था। अतएव जनक प्रसन्न तो हुए, परन्तु जब उन्होंने उस धनुष की कठोरता और अपनी कन्या के विवाह-विषय में अपनी प्रतिज्ञा का विचार किया तब उनको दुःख हुआ। उन्होंने मन में कहा कि धनुष झुका लेना बड़ा कठिन काम है, मुझसे बड़ी भूल हुई जो मैंने कन्यादान का मोल उसे चढ़ा लेना निश्चित किया। वे विश्वामित्र से बोले:—

"भगवन्! जो काम बड़े बड़े मतवाले हाथियों से भी होना कठिन है उसे करने के लिए यदि हाथी का बच्चा उत्साह दिखावेगा तो अवश्य ही उसका साहस व्यर्थ हुए बिना न रहेगा। अतएव, ऐसी चेष्टा करने की सलाह मैं नहीं दे सकता। न मालूम कितने धनुर्धारी राजाओं को इस धनुष से लज्जित होना पड़ा है। वे राजा कोई ऐसे वैसे धनुषधारी न थे। वे बड़े वीर थे। प्रत्यञ्चा की फटकारें लग लग कर उनकी रगड़ से, उनकी भुजाओं का चमड़ा कड़ा हो गया था। पर जब वे इस धनुष को उठा कर उस पर प्रत्यञ्चा न चढ़ा सके तब अपनी भुजाओं को धिक्कारते हुए बेचारे लौट गये। अतएव, तात, आपही सोचिए, रामचन्द्र को अपने उत्साह में सफल होने की कहाँ तक आशा की जा सकती है।"

महर्षि ने प्रत्युत्तर दिया:—"राम को आप निरा बालक ही न समझिए। वह महाबली है। अथवा, इस विषय में, अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। पर्वत पर अपनी शक्ति प्रकट करनेवाले वज्र की तरह, आपके धनुष पर ही राम अपने बल का वैभव प्रकट कर दिखावेगा। ज़रा उसे धनुष की परीक्षा तो कर लेने दीजिए। उसी से आपको राम के शरीर-सामर्थ्य का पता लग जायगा।"

सत्यवादी विश्वामित्र से यह बात सुन कर, सिर पर ज़ुल्फ़ रखाये हुए अल्पवयस्क राम के पौरुष पर जनक को विश्वास आ गया। वे समझ गये कि रामचन्द्र कोई साधारण बालक नहीं, वे महा पराक्रमी हैं। वीरबहूटी के बराबर आग के छोटे से कण में भी जैसे ढेरों लकड़ी जला कर ख़ाक कर देने की शक्ति होती है वैसे ही उम्र कम होने पर भी राम में वीरता के बड़े बड़े काम कर दिखाने की शक्ति है। मन में इस तरह का निश्चय करके जनक ने अपने सेवकों के कई एक समूहों को धनुष लाकर रामचन्द्र के सामने उपस्थित करने की आज्ञा—इन्द्र जैसे बादलों को अपना तेजोमय धनुष लाने की आज्ञा देता है—दी। जनक की आज्ञा का तत्काल पालन किया गया। धनुष लाया गया। सोते हुए नागराज के सदृश उस महाभयङ्कर धनुष को देखते ही रामचन्द्र ने उसे उठा लिया। यह वही धनुष था जिससे छूटे हुए वृषध्वज शङ्कर के बाण ने भागते हुए यज्ञरूपी हिरन