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नवाँ सर्ग।


हवा के झोंकों से उपवनों के फूल जो हिले तो उनका पराग गिर गिर कर चारों तरफ़ फैल गया और हवा के साथ ही वह भी इधर उधर उड़ने लगा। बस, फिर क्या था, जिधर पराग की रेणुका गई उधर ही उसकी सुगन्धि से खिँचे हुए भारे भी, उसके पीछे पीछे, उड़ते गये। इस पराग-रेणु को कोई ऐसी वैसी चीज़ न समझिए। वासन्ती शोभा इसी के चूर्ण को अपने चेहरे पर मल कर अपने लालण्य की वृद्धि करती है और कुसुमशायक इसी को अपनी पताका का पट बनाता है।

उद्यानों में नये झूले पड़ गये। सब लोग अपने अपने प्रेम-पात्रों को साथ लेकर झूलने और वसन्त-सम्बन्धी उत्सव मनाने लगे। इतने में कोयलों ने, अपनी कूकों के बहाने, वसन्त के सखा की आज्ञा इस प्रकार सुनाई:—"देखना, जो इस समय किसी ने आपस में विरोध किया! मान को एकदम दूर कर दो। विग्रह और विरोध छोड़ दो। ऐसा समय बार बार नहीं आता। उम्र भी सदा एक सी नहीं रहती।" कहने की आवश्यकता नहीं, लोगों ने इस आज्ञा के अक्षर अक्षर का परिपालन किया।

राजा दशरथ ने भी, अपनी विलासिनी रानियों के साथ, वसन्तोत्सव का यथेष्ट आनन्द लूटा। उत्सव समाप्त होने पर उसके हृदय में शिकार खेलने की इच्छा उत्पन्न हुई। अतएव, विष्णु के समान पराक्रमी, वसन्त के समान सौरभवान् और मन्मथ के समान सुन्दर उस राजा ने इस विषय में, अपने मन्त्रियों से सलाह ली। उन्होंने कहा—"बहुत अच्छी बात है। आप शिकार खेलने जाइए। शिकार से कोई हानि नहीं। उससे तो बहुत लाभ है। भागते हुए हिरनों पर दूसरे जङ्गली जानवरों का शिकार करने से मनुष्य को हिलते हुए निशाने मार लेने का अभ्यास हो जाता है। उसे इस बात का भी ज्ञान हो जाता है कि क्रोध में आने और डर जाने पर जानवर कैसी चेष्टा करते हैं। शिकारी को जानवरों की चेष्टा ही से यह मालूम हो जाता है कि इस समय वे क्रोध में है और इस समय डरे हुए हैं। शिकार में दौड़-धूप का काम बहुत रहता है। इससे मनुष्य श्रमसहिष्णु भी हो जाता है। बिना थकावट के वह बड़े बड़े श्रमसाध्य काम कर सकता है। श्रम करने से शरीर फुर्तीला रहता है। इनके सिवा शिकार में और भी कितने ही गुण हैं"।

मन्त्रियों की सम्मति अनुकूल पाकर दशरथ ने शिकारी कपड़े पहने। शिकार का सब सामान साथ लिया। अपने पुष्ट कण्ठ में धनुष डाला। मृग, सिंह गौर वराह आदि जङ्गली पशुओं से परिपूर्ण वन में प्रवेश करने के इरादे से, उस सूर्य के समान प्रतापी राजा ने अपनी राजधानी से प्रस्थान