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सातवाँ सर्ग।

चले गये। यहाँ तक कि सभी गिर गये। खिड़की के पास पहुँचने पर उसके पैर के अँगूठे में बँधा हुआ डोरा मात्र बाक़ी रह गया।

इस प्रकार उस रास्ते के दोनों तरफ़ जितने मकान थे उनकी खिड़कियों में इतनी स्त्रियाँ एकत्र हो गईं कि सर्वत्र मुख ही मुख दिखाई देने लगे। कहीं तिल भर भी जगह ख़ाली न रह गई। इससे ऐसा मालूम होने लगा कि उन खिड़कियों में हज़ारों कमल खिले हुए हैं। अज को देखने के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हुई इन स्त्रियों के मुख, कमल के सभी गुणों से युक्त, थे। कमल में सुगन्धि होती है; मुखों से भी सुवासित मद्य की सुगन्धि आ रही थी। कमलों पर भौंरे उड़ा करते हैं, मुखों में भी काले काले नेत्र चञ्चलता दिखा रहे थे।

अज को देखते ही पुरवासिनी स्त्रियों ने उसे अपनी आँखों से पीना सा आरम्भ कर दिया। उनकी दर्शनोत्कण्ठा इतनी बढ़ी हुई थी कि उस समय उन्हें संसार के और सभी काम भूल गये। यहाँ तक कि नेत्रों को छोड़ कर उनकी और इन्द्रियों ने अपने अपने विषय-व्यापार ही बन्द कर दिये। कानों ने सुनना और मुँह ने बोलना छोड़ दिया। सारांश यह कि सारी स्त्रियाँ बड़ी ही एकाग्र-दृष्टि से अज को देखने लगीं। उनका निर्निमेष अवलोकन देख कर यह भासित होने लगा जैसे उनकी अन्य सारी इन्द्रियाँ सम्पूर्ण-भाव से उनकी आँखों ही में घुस गई हों। अज-कुमार को अच्छी तरह देख चुकने पर, पुरवासिनी स्त्रियों की दर्शनात्कण्टा जब कुछ कम हुई तब, वे, परस्पर, इस प्रकार बातें करने लगीं:—

"कितने ही बड़े बड़े राजा ने राजा भोज के पास दूत भेज कर इन्दुमती की मँगनी की थी—उन्होंने इन्दुमती के साथ विवाह करने की हार्दिक इच्छा, अपने ही मुँह से, प्रकट की थी—परन्तु इन्दुमती को यह बात पसन्द न आई। उसने उनकी प्रार्थना स्वीकार न की। उसने साफ़ कह दिया कि बिना देखे मैं किसी के भी साथ विवाह करने का वचन नहीं दे सकती। जान पड़ता है, इसी से वे राजा लोग अप्रसन्न हो गये और स्वयंवर में नहीं आये। परन्तु हमारी समझ में इन्दुमती ने यह बहुत ही अच्छा किया जो उनमें से किसी को भी स्वीकार न किया। स्वयंवर में मनमाना पति आपही ढूँढ़ लेने का यदि वह निश्चय न करती तो—लक्ष्मी को नारायण के समान—उसे अज के सदृश अनुरूप पति कभी न मिलता। अज-इन्दुमती की अलौकिक जोड़ी हमें तो लक्ष्मी-नारायण ही की जोड़ी के समान सुन्दर जान पड़ती है। हमने, आज तक, ऐसा अप्रतिम रूप और कहीं नहीं देखा था। यदि ब्रह्मा इन दोनों को परस्पर न मिला देता तो इन्हें इतना सुन्दर बनाने के लिए उसने जो प्रचण्ड परिश्रम किया था वह सारा का सारा अकारथ जाता। हमारी भावना तो यह है कि ये दोनों—

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