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पाँचवाँ सर्ग।

वाले सूत-पुत्रों ने, मधुर स्वर में, भैरवी गा गा कर, जगाना आरम्भ किया। वे बोले:—

"हे बुध-वर! रात बीत गई। सूर्य्य निकलने चाहता है। शय्या छोड़िए। उठ बैठिए। ब्रह्मा ने इस संसार के भार के दो भाग कर दिये हैं। उनमें से एक भाग का भार तो आपका पिता, निद्रा छोड़ कर, बड़े ही निरालस भाव से, उठा रहा है। रहा दूसरा, सो उसे उठाना आपका काम है। अतएव, उठ कर उसे सँभालिए। दो आदमियों का काम एक से नहीं हो सकता।

"आप पर लक्ष्मी अत्यन्त अनुरक्त है। वह आपको एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ना चाहती। तिस पर भी निद्रा के वशीभूत होकर आपने उसका स्वीकार न किया। इस कारण, वियोग-व्यथा ने उसे बहुत ही खिन्न कर दिया। आपको निद्रा की गोद में देख, खण्डिता स्त्री की तरह, यह बेतरह घबरा उठी। रात बिताना उसके लिए दुःसह हो गया। इस दशा को प्राप्त होने पर, वह अपने वियोग-दुःख को कम करने का उपाय ढूँढ़ने लगी। उसने देखा कि चन्द्रमा में आपके मुख की थोड़ी बहुत समता पाई जाती है। इससे चलो, उसी को देख देख, किसी तरह जी बहलावे और रात काट दें। परन्तु, वह चन्द्रमा भी, इस समय, पश्चिम दिशा की तरफ़ जा रहा है और आपके मुख का सादृश्य अब उससे अदृश्य हो रहा है। अतएव, निद्रा छोड़ कर अब आप इस अनन्यशरण लक्ष्मी को अवश्य ही अवलम्ब दीजिए। चन्द्रास्त हो जाने पर इसे बिलकुल ही निराश्रित न कर डालिए। उठिए, उठिए।

"बाल-सूर्य की किरणों का स्पर्श होते ही, अभी ज़रा ही देर में, सूर्य्य-विकासी कमल खिल उठेंगे। आप भी अब अपने सुन्दर नेत्र खोल दीजिए। फिर, देखिए कि चञ्चल और काली काली कोमल पुतली वाले आपके नेत्र और भीतर भरे हुए चञ्चल भौंरों वाले कमल किस तरह एक दूसरे की बराबरी करते हैं। यदि दोनों एकही साथ अच्छी तरह खिल उठें तो यह देखने को मिल जाय कि आपके नेत्रों और कमलों में परस्पर कितना सादृश्य है। कुमार, इस प्रातःकालीन पवन को तो देखिए। यह बड़ा ही ईर्ष्यालु है। आपके मुख के सुगन्धिपूर्ण स्वाभाविक श्वासोच्छास की बराबरी करने के लिए यह बड़ी बड़ी चेष्टायें कर रहा है। दूसरों के गुण उधार लेकर यह उसके सदृश सुगन्धित होना चाहता है। जान पड़ता है, इसी से यह वृक्षों की डालियों से शिथिल हुए फूलों को बार बार गिराता और सूर्य की किरणों से विकसित हुए कमलों को बार बार जा जा कर छूता है। वृक्षों के