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रंगभूमि


लड़का बैठा हुआ है, जो चुका देगा। कौन उद्दम करूँ? किसी बड़े आदमी के घर पंखा खींच सकता हूँ, लेकिन यह काम भी तो साल में चार ही महीने रहता है, बाकी आठ महीने क्या करूँगा? सुनता हूँ, अंधे कुर्सी, माढ़े, दरी, टाट बुन सकते हैं, पर यह काम किससे सीखूँ? कुछ भी हो, अब भीख न माँगूँगा।

चारों ओर से निराश होकर सूरदास के मन में विचार आया कि इस जमीन को क्यों न बेच दूँ। इसके सिवा अब मुझे और कोई सहारा नहीं है। कहाँ तक बाप-दादों के नाम को रोऊँ। साहब उसे लेने को मुँह फैलाये हुए हैं। दाम भीअ च्छा दे रहे हैं। उन्हीं को दे दूँ। चार-पाँच हजार बहुत होते हैं। अपने घर सेठ की तरह बैठा हुआ चैन की बंसी बजाऊँगा। चार आदमी घेरे रहेंगे, मुहल्ले में अपना मान होने लगेगा। ये ही लोग, जो आज मुझ पर रोब जमा रहे हैं, मेरा मुँह जोहेंगे, मेरी खुशामद करेंगे। यही न होगा, मुहल्ले की गउएँ मारी-मारी फिरेंगी फिरें, इसको मैं क्या करूँ। जब तक निभ सका, निभाया। अब नहीं निभता, तो क्या करूँ। जिनकी गायें चरती हैं, कौन मेरी बात पूछते हैं। आज कोई मेरी पीठ पर खड़ा हो जाता, तो भैरो मुझे रुलाकर यो मूछों पर ताव देता हुआ न चला जाता। जब इतना भी नहीं है, तो मुझे क्या पड़ी है कि दूसरों के लिए मरूँ। जी से जहान है; जब आबरू ही न रही, तो जीने पर धिक्कार है।

मन में यह विचार स्थिर करके सूरदास अपनी झोपड़ी से निकला, और लाठी टेकता हुआ गोदाम की तरफ चला। गोदाम के सामने पहुँचा, तो दयागिर से भेंट हो गई। उन्होंने पूछा- "इधर कहाँ चले सूरदास? तुम्हारी जगह तो पीछे छूट गई।"

सूरदास—"जरा इन्हीं मियाँ साहब से कुछ बातचीत करनी है।"

दयागिर—"क्या इसी जमीन के बारे में?"

सूरदास—“हाँ, मेरा विचार है कि यह जमीन बेचकर कहीं तीर्थयात्रा कस्ने चला जाऊँ। इस मुहल्ले में अब निबाह नहीं है।"

दयागिर---"सुना, आज भैरो तुम्हें मारने की धमकी दे रहा था।"

सूरदास—"मैं तरह न दे जाता, तो उसने मार ही दिया था। सारा मुहल्ला बैठा हँसता रहा, किसी की जबान न खुली की अंधे-अपाहिज आदमी पर यह कुन्याव क्यों करते हो। तो जब मेरा कोई हितू नहीं है, तो मैं क्यों दूसरों के लिए मरूँ?"

दयागिर—"नहीं सूरे, मैं तुम्हें जमीन बेचने की सलाह न दूँगा। धर्म का फल इसा जीवन में नहीं मिलता। हमें आँखें बंद करके नारायन पर भरोसा रखते हुए धर्म-मार्ग पर चलते रहना चाहिए। सच पूछो, तो आज भगवान् ने तुम्हारे धर्म की परीक्षा की है। संकट ही में धीरज और धर्म की परीक्षा होती है। देखो, गुसाईजी ने कहा है—

'आपति-काल परखिए चारी; धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।'

जमीन पड़ी है, पड़ी रहने दो। गउएँ चरती हैं, यह कितना बड़ा पुण्य है। कौन जानता है, कभी कोई दानी, धर्मात्मा आदमी मिल जाय, धर्मशाला, कुआँ, मंदिर बनवा दे, तो