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रंगभूमि


वह उसी क्रोध-प्रवाह में न जाने और क्या-क्या कहती कि मि० जॉन सेवक उनका हाथ पकड़कर वहाँ से खींच ले गये। रानी जाह्नवी ने इन अपमानसूचक, कटु शब्दों का कुछ भी उत्तर न दिया, मिसेज सेवक को सहवेदना-पूर्ण नेत्रों से देखती रहीं और तब बिना कुछ कहे-सुने वहाँ से उठकर चली गई।

मिसेज सेवक की महत्त्वाकांक्षाओं पर तुषार पड़ गया। उस दिन से फिर उन्हें किसी ने गिरजाघर जाते नहीं देखा, वह फिर कभी गाउन और हैट पहने हुए न दिखाई दी, फिर योरपियन क्लब में नहीं गई और फिर अँगरेजी दायतों में सम्मिलित नहीं हुई। दूसरे दिन प्रातःकाल पादरी पिम और मि० क्लार्क मातमपुरसी करने आये। मिसेज सेवक ने दोनों को वह फटकार सुनाई कि अपना-सा मुँह लेकर चले गये। सारांश यह कि उसी दिन उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई, मस्तिष्क इतने कठोराघात को सहन न कर सका। वह अभी तक जीवित हैं, पर दशा अत्यंत करुण है। आदमियों की सूरत से घृणा हो गई है, कभी हँसती हैं, कभी रोती हैं, कभी नाचती हैं, कभी गाती हैं। कोई समीप जाती है, तो दाँतों काटने दौड़ती हैं।

रहे मिस्टर जॉन सेवक। वह निराशामय धैर्य के साथ प्रातःकाल से संध्या तक अपने व्यावसायिक धंधों में रत रहते हैं। उन्हें अब संसार में कोई अभिलाषा नहीं है, कोई इच्छा नहीं है, धन से उन्हें निस्स्वार्थ प्रेम है, कुछ वही अनुराग, जो भक्तों को अपने उपास्य से होता है। धन उनके लिए किसी लक्ष्य का साधन नहीं है, स्वयं लक्ष्य है। न दिन को दिन समझते हैं, न रात को रात। कारबार दिन-दिन बढ़ता जाता है। लाभ दिन-दिन बढ़ता जाता है या नहीं, इसमें संदेह है। देश में गली-गली, दूकान-दूकान इस कारखाने के सिगार और सिगरेटों की रेल पेल है। वह अब पटने में एक तंबाकू की मिल खोलने की आयोजना कर रहे हैं, क्योंकि विहार-प्रांत में तंबाकू कसरत से पैदा होती है। उनको धनकामना विद्या-व्यसन की भाँति तृप्त नहीं होती।