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चारों आदमी शफाखाने पहुँचे, तो नौ बज चुके थे। आकाश निद्रा में मग्न, आँखें बंद किये, पड़ा हुआ था, पर पृथ्वी जाग रही थी। भैरो खड़ा सूरदास को पंखा झल रहा था, लोगों को देखते ही उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। सिरहाने की ओर कुर्सी पर बैठी हुई सोफिया चिंताकुल नेत्रों से सूरदास को देख रही थी। सुभागी अंगठी में आग बना रही थी कि थोड़ा-सा दूध गर्म करके सूरदास को पिलाये। तीनों ही के मुख पर नैराश्य का चित्र खिंचा हुआ था। चारों ओर वह नि:स्तब्धता छाई हुई थी, जो मृत्यु का पूर्वाभास है।

सोफ़ी ने कातर स्वर में कहा-"पंडाजी, आज शोक की रात है। इनकी नाड़ी का कई-कई मिनटों तक पता नहीं चलता। शायद आज की रात मुश्किल से कटे। चेष्टा बदल गई।”

भैरो-“दो पहर से यही हाल है; न कुछ बोलते हैं, न किसी को पहचानते हैं।" सोफी-“डॉक्टर गंगुली आते होंगे। उनका तार आया था कि मैं आ रहा हूँ। यों तो मौत की दवा किसी के पास नहीं; लेकिन संभव है, डॉक्टर गंगुली के हाथों कुछ यश लिखा हो।"

सुभागी-“मैंने साँझ को पुकारा था, तो आँखें खोली थीं; पर बोले कुछ नहीं।" ठाकुरदीन-"बड़ा प्रतापी जीव था ।"

यही बातें हो रही थीं कि एक मोटर आई और कुँवर भरतसिंह, डॉक्टर गंगुली और रानी जाह्नवी उतर पड़ी, गंगुली ने सूरदास के मुख की ओर देखा और निराशा.की मुस्किराहट के साथ बोले-"हमको दस मिनट का भी देर होता, तो इनका दर्शन भी न पाते । विमान आ चुका है। क्यों दूध गरम करता है भाई, दूध कौन पियेगा ? यमराज तो दूध पीने का मुहलत नहीं देता।"

सोफिया ने सरल भाव से कहा-"क्या अब कुछ नहीं हो सकता डॉक्टर साहब?" गंगुली-"बहुत कुछ हो सकता है मिस सोफ़िया !हम यमराज को परास्त कर देगा। ऐसे प्राणियों का यथार्थ जीवन तो मृत्यु के पीछे ही होता है, जब वह पंचभूतों.के संस्कार से रहित हो जाता है । सूरदास अभी नहीं मरेगा, बहुत दिनों तक नहीं मरेगा। हम सब मर जायगा, कोई कल, कोई परसों; पर सूरदास तो अमर हो गया, उसने तो काल को जीत लिया। अभी तक उसका जीवन पंचभूतों के संस्कार से सीमित था । अब वह प्रसारित होगा, समस्त प्रांत को, समस्त देश को जागृति प्रदान करेगा, हमें कर्मण्यता का, वीरता का आदर्श बनायेगा । यह सूरदास की मृत्यु नहीं है सोफी, यह उसके जीवन-ज्योति का विकास है। हम तो ऐसा ही समझता है।'

यह कहकर डॉक्टर गंगुली ने जेब से एक शोशी निकाली और उसमें से कई बूंदें