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रंगभूमि


गया है। सभी सहृदयता और विनय के पुतले हैं। यहाँ तक कि नौकर चाकर भी इशारों पर काम करते हैं। मुझे आज चौथे दिन होश आया है? पर इन लोगों ने इतने प्रेम से सेवा-शुश्रूषा न की होती, तो शायद मुझे हफ्तों बिस्तर पर पड़ा रहना पड़ता। मैं अपने घर में भी ज्यादा-से-ज्यादा इतने ही आराम से रहती।”

मिसेज सेवक-"तुमने अपनी जान जोखिम में डाली थी, तो क्या ये लोग इतना भी करने से रहे?"

सोफिया-"नहीं मामा, ये लोग अत्यन्त सुशील और सजन हैं। खुद रानीजी प्रायः मेरे पास बैठी पंखा झलती रहती हैं। कुँवर साहब दिन में कई बार आकर देख जाते हैं, और इंदु से तो मेरा बहनापा-सा हो गया है। यही लड़की है, जो मेरे साथ नैनीताल में पढ़ा करती थी।"

मिसेज़ सेवक-(चिढ़कर) "तुझे दूसरों में सब गुण-ही-गुण नजर आते हैं। अवगुण सब घरवालों ही के हिस्से में पड़े हैं। यहाँ तक कि दूसरे धर्म भी अपने धर्म से अच्छे है।

प्रभु सेवक-"मामा, आप तो जरा-जरा-सी बात पर तिनक उठती हैं। अगर कोई अपने साथ अच्छा बरताव करे, तो क्या उसका एहसान न माना जाय? कृतघ्नता से "जुरा कोई दूषण नहीं है।"

मिरेज सेवक-"यह कोई आज नई बात थोड़े ही है। घरवालों की निन्दा तो इसकी आदत हो गई है। यह मुझे जताना चाहती है कि ये लोग इसके साथ मुझसे ज्यादा प्रेम करते हैं। देखू, यहाँ से जाती है, तो कौन-सा तोहफा दे देते हैं। कहाँ हैं तेरी रानी साहब? मैं भी उन्हें धन्यवाद दे दूँ। उनसे आज्ञा ले लो, और घर चलो। "पापा अकेले घबरा रहे होंगे।"

सोफिया-"वह तो तुमसे मिलने को बहुत उत्सुक थीं। कब की आ गई होती, पर कदाचित् हमारे बीच में बिना बुलाये आना अनुचित समझती होंगी।"

प्रभु सेवक—“मामा, अभी सोफी को यहाँ दो-चार दिन और आराम से पड़ी रहने दीजिए। अभी इसे उठने में कष्ट होगा। देखिए, कितनी दुर्बल हो गई है!”

सोफिया—"रानीजी भी यही कहती थीं कि अभी मैं तुम्हें न जाने दूँगी।"

मिसेज सेवक—"यह क्यों नहीं कहतो कि तेरा ही जी यहाँ से जाने को नहीं चाहता। वहाँ तेरा इतना प्यार कौन करेगा!"

सोफिया—"नहीं मामा, आप मेरे साथ अन्याय कर रही हैं। मैं अब यहाँ एक दिन भी नहीं रहना चाहती। इन लोगों को मैं अब ओर कट न दूँगी। मगर एक बात मुझे मालूम हो जानी चाहिए। मुझ पर फिर तो अत्याचार न किया जायगा? मेरी धार्मिक स्वतन्त्रता में फिर तो कोई बाधा न डाली जायगो?"

प्रभु सेवक—"सोफी, तुम व्यर्थ इन बातों की क्यों चर्चा करतो हो? तुम्हारे साथ कौन-सा अत्याचार किया जाता है! जरा-सी बात का बतंगड़ बनाती हो।"