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रंगभूमि


कि उस पर कोई आघात के चिह्न तो नहीं हैं। तब उठी और बोलीं-"बहुत दिनों में आये बेटा! आओ, छाती से लगा लूँ।" लेकिन विनय ने तुरंत उनके चरणों पर सिर रख दिया। रानीजी को अश्रु-प्रवाह में न कुछ सूझता था और न प्रेमावेश में कोई बात मुंह से निकलती थी, झुकी हुई विनय का सिर पकड़ कर उठाने की चेष्टा कर रही थीं। भक्ति और वात्सल्य का कितना स्वर्गीय संयोग था।

लेकिन विनय को रानी की बातें भूली न थीं। माता को देखकर उसके दिल में जोश उठा कि इनके चरणों पर आत्मसमर्पण कर दूं। एक विवशकारी उद्गार या प्राण दे देने के लिए, वहीं माता के चरणों पर जीवन का अंत कर देने के लिए, दिखा देने के लिए कि यद्यपि मैंने अपराध किये हैं, पर सर्वथा लज्जाहीन नहीं हूँ, जीना नहीं जानता, लेकिन मरना जानता हूँ। उसने इधर-उधर निगाह दौड़ाई। सामने ही दीवार पर तलवार लटक रही थी। वह कौंदकर तलवार उतार लाया और उसे सर्र से खोंच कर बोला-अम्माँ, इस योग्य तो नहीं हूं कि आपका पुत्र कहलाऊँ, लेकिन आपकी अंतिम आज्ञा शिरोधार्य करके अपनी सारी अपकीर्ति का प्रायश्चित्त किये देता हूँ। मुझे आशीर्वाद दीजिए।"

सोफिया चिल्लाकर विनय से लिपट गई। जाह्नवी ने लपककर उसका हाथ पकड़ लिया और बोलीं-विनय, ईश्वर साक्षी है, मैं तुम्हें कब का क्षमा कर चुकी। तलवार छोड़ दो। सोफी, तू इनके हाथ से तलवार छीन ले, मेरी मदद कर।"

विनयसिंह की मुखाकृति तेजोमय हो रही थी, आँखें बीरबहूटी बनी हुई थीं। उसे अनुभव हो रहा था कि गरदन पर तलवार मार लेना कितना सरल है। सोफिया ने दोनों हाथों से उसकी कलाई पकड़ ली और अश्रु-पूरित लोचनों से ताकती हुई बोली-"विनय, मुझ पर दया करो!"

उसकी दृष्टि इतनी करुण, इतनी दीन थी कि विनय का हृदय पसीज गया। मुट्ठी ढोली पड़ गई। सोफिया ने तलवार लेकर खूटी पर लटका दी। इतने में कुँवर भरतसिंह आकर खड़े हो गये और विनय को हृदय से लगाते हुए बोले-“तुम तो बिलकुल पहचाने नहीं जाते, मूंछे कितनी बढ़ गई हैं। इतने दुबले क्यों हो? बीमार थे क्या?”

विनय—"जी नहीं, बीमार तो नहीं था। ऐसा दुबला भी नहीं हूँ। अब माताजी के हाथों के पकवान खाकर मोटा हो जाऊँगा।"

कुँवर—"तुम दूर क्यों खड़ी हो सोफिया? आओ, तुम्हें भी प्यार कर लूँ। रोज ही तुम्हारी याद आती थी। विनय बड़ा भाग्यशाली था कि तुम-जैसी रमणी पाई। संसार में तो मिलती नहीं, स्वर्ग की मैं नहीं कहता। अच्छा संयोग है कि तुम दोनों एक ही दिन आये। बेटी, मैं तुमसे विनय की सिफारिश करता हूँ। तुमने इन्हें जो फटकार बताई थी, उसे सुनकर बेचारा नायकराम स्त्रियों से इतना डर गया है कि तय की-कराई ‘सगाई से इनकार कर गया। उम्र-भर स्त्री के लिए तरसता रहा, पर अब नाम भी नहीं