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विनयसिंह आबादी में दाखिल हुए, तो सवेरा हो गया था। थोड़ी ही दूर चले थे कि एक बुढ़िया लाठी टेकती सामने से आती हुई दिखाई दी। इन्हें देखकर बोली—"बेटा, गरीब हूँ। बन पड़े, तो कुछ दे दो। धरम होगा।"

नायकराम—"सबेरे राम-नाम नहीं लेती, भीख माँगने चल खड़ी हुई। तुझे तो जैसे रात को नींद नहीं आई। माँगने को तो दिन-भर है।"

बुढ़िया—"बेटा, दुखिया हूँ।"

नायकराम—'यहाँ कौन सुखिया है। रात-भर भूखों मरे। मासूक की घुड़कियाँ खाई। पैर तो सीधे पड़ते नहीं, तुम्हें कहाँ से पैसा दें?"

बुढ़िया—"बेटा, धूप में मुझसे चला नहीं जाता, सिर में चक्कर आ जाता है। नई-नई विपत है, भैया, भगवान उस अधम पापी विनयसिंह का बुरा करे, उसी के कारण बुढ़ापे में यह दिन देखना पड़ा; नहीं तो बेटा दूकान करता था, हम घर में रानी बनी बैठी रहती थीं, नौकर-चाकर थे, कौन-सा सुख नहीं था। तुम परदेसी हो, न जानते होगे, यहाँ दंगा हो गया था, मेरा लड़का दूकान से हिला तक नहीं, पर उस निगोड़े विनयसिंह ने सहादत दे दी कि यह भी दंगे में मिला हुआ था। पुलिस हमारे ऊपर बहुत दिनों से दाँत लगाये थी, कोई दाँव न पाती थी। यह सहादत पाते ही दौड़ आ गई, लड़का पकड़ लिया गया और तीन साल की सजा हो गई। एक हजार जरीबाना हुआ। घर की बीस हजार की गृहस्थी तहस-नहस हो गई। घर में बहू है, छोटे बच्चे है, इसी तरह माँग जाँचकर उनको पालती- पोसती हूँ। न जाने उस कलमुँहे ने कब का बैर निकाला!”

विनय ने जेब से एक रुपया निकालकर बुढ़िया को दिया और आकाश की ओर देखकर ठंडी साँस ली। ऐसी मानसिक वेदना उन्हें कभी न हुई थी।

बुढ़िया ने रुपया देखा, तो चौंक पड़ी। समझी, शायद भूल से दिया है। बोली-"बेटा, यह तो रुपया है!"

विनय ने अवरुद्ध कंठ से कहा-"हाँ, ले जाओ, मैंने भूल से नहीं दिया है।"

वृद्धा आशीर्वाद देती हुई चली गई। दोनों आदमी और आगे बढ़े तो राह में एक कुऑ मिला। उस पर पीपल का पेड़ था। एक छोटा-सा मंदिर भी बना हुआ था। नायकराम ने सोचा, यहीं हाथ-मुँह धो लें। दोनों आदमी कुएँ पर गये, तो देखा, एक विप्र महाराज पीपल के नीचे बैठे पाठ कर रहे हैं। जब वह पाठ कर चुके, तो विनय ने पूछा-"आपको मालूम है, सरदार नीलकंठ आजकल कहाँ हैं?"

पण्डितजी ने कर्कश कंठ से कहा-"हम नहीं जानते।"

विनय-"पुलिस के मंत्री तो होंगे?"