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रंगभूमि


मूर्ति आँखों के सामने आ जाती, कभी किसी विदुषी महिला के चंद्रमुख के दर्शन होते, जिन्हें यह सेंट मेरी समझती।

चौथे दिन प्रातःकाल उसने आँखें खोलीं, तो अपने को एक सजे हुए कमरे में पाया। गुलाब और चंदन की सुगंध आ रही थी। उसके सामने कुरसी पर वही महिला बैठी हुई थीं, जिन्हें उसने सुषुप्तावस्था सेंट मेरी समझा था, और सिरहाने की ओर एक वृद्ध पुरुष बैठे हुए थे, जिनकी आँखों से दया टपकी पड़ती थी। इन्हीं को कदाचित् उसने, अर्द्ध-चेतना की दशा में, ईसा समझा था। स्वप्न की रचना स्मृतियों की पुनरावृत्ति-मात्र होती है।

सोफिया ने क्षीण स्वर में पूछा—"मैं कहाँ हूँ? मामा कहाँ हैं?"

वृद्ध पुरुष ने कहा—"तुम कुँवर भरतसिंह के घर में हो। तुम्हारे सामने रानी साहब बैठी हुई हैं, तुम्हारा जी अब कैसा है?"

सोफिया—"अच्छी हूँ, प्यास लगी। मामा कहाँ हैं, पापा कहाँ हैं, आप कौन हैं?"

रानी—"यह डॉक्टर गंगुली हैं, तीन दिन से तुम्हारी दवा कर रहे हैं। तुम्हारे पापा-मामा कौन हैं?

सोफिया—“पापा का नाम मि० जॉन सेवक है। हमारा बँगला सिगरा में है।”

डॉक्टर—"अच्छा, तुम मि० जॉन सेवक की बेटी हो? हम उसे जानता है; अभी बुलाता है।"

रानी—"किसी को अभी भेज दूँ?"

सोफिया—"कोई जल्दी नहीं है, आ जायँगे। मैंने जिस आदमी को पकड़कर खींचा था, उसकी क्या दशा हुई?"

रानी—"बेटी, वह ईश्वर की कृपा से बहुत अच्छी तरह है। उसे जरा भी आँच नहीं लगी। वह मेरा बेटा विनय है। अभी आता होगा। तुम्हीं ने तो उसके प्राण बचाये। अगर तुम दोड़कर न पहुँच जातीं, तो आज न जाने क्या होता। मैं तुम्हारे ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकती। तुम मेरे कुल की रक्षा करनेवाली देवी।”

सोफिया—"जिस घर में आग लगी थी, उसके आदमी सब बच गये?"

रानी—"बेटी,यह तो केवल अभिनय था। विनय ने यहाँ एक सेवा-समिति बना रखी है! जब शहर में कोई मेला होता है, या कहीं से किसी दुर्घटना का समाचार आता है, तो समिति वहाँ पहुँचकर सेवा-सहायता करती है। उस दिन समिति की परीक्षा के लिए कुँवर साहब ने वह अभिनय किया था।”

डॉक्टर—"कुँवर साहब देवता है, कितने गरीब लोगों की रक्षा करता है। यह समिति, अभी थोड़े दिन हुए, बंगाल गई थी। यहाँ सूर्य-ग्रहण का स्नान होनेवाला है। लाखों यात्री दूर-दूर से आयेगा। उसके लिए यह सब तैयारी हो रही है।”

इतने में एक युवती रमणी आकर खड़ी हो गई। उसके मुख से उज्ज्वल दीपक