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रंगभूमि


बढ़ता जाता है; उस पर कोई शंका करे, तो सरकार बोलता है, आपको ऐसा बात नहीं कहना चाहिए। बजट बनाने लगता है, तो हरएक आइटेम में दो-चार लाख ज्यादा लिख देता है। हम काउंसिल में जब जोर देता है, तो हमारा बात रखने के लिए वही फालतू रुपया निकाल देता है। मेंबर खुशी के मारे फूल जाता है—हम जीत गया, हम जीत गया! पूछो, तुम क्या जीत गया? तुम क्या जीतेगा? तुम्हारे पास जीतने का साधन ही नहीं है, तुम कैसे जीत सकता है? कभी हमारे बहुत जोर देने पर किफायत किया जाता है, तो हमारे ही भाइयों का नुकसान होता है। जैसे अबकी हमने पुलिस-विभाग में ५ लाख काट दिया। मगर यह कमी बड़े-बड़े हाकिमों के भत्ते या तलब में नहीं किया गया। बिचारा चौकीदार, कांसटेबल, थानेदार का तलब घटावेगा, जगह तोड़ेगा। इससे अब किफायत का बात कहते हुए भी डर लगता है कि इससे हमारे ही भाइयों का गरदन कटता है। सारा काउंसिल जोर देता रहा कि बंगाल की बाढ़ के सताये हुए आदमियों के सहायतार्थ २० लाख मंजूर किया जाय; सारा काउंसिल कहता रहा कि मि० क्लार्क का उदयपूर से बदली कर दिया जाय, पर सरकार ने मंजूर नहीं किया। काउंसिल कुछ नहीं कर सकता। एक पत्ती तक नहीं तोड़ सकता। जो आदमी काउंसिल को बना सकता है, वही उसको बिगाड़ भी सकता है। भगवान् ज़िलाता है, तो भगवान् ही मारता है। काउंसिल को सरकार बनाता है और वह सरकार की मुट्ठी में है। जब जाति द्वारा काउंसिल बनेगा, तब उससे देश का कल्यान होगा। यह सब जानता है, पर कुछ न करने से कुछ करते रहना अच्छा है। मरना भी मरना है, और खाट पर पड़े रहना भी मरना है; लेकिन एक अवस्था में कोई आशा नहीं रहता, दूसरी अवस्था में कुछ आशा रहता है। बस, इतना ही अंतर है, और कुछ नहीं।"

इंदु ने छेड़कर पूछा—"जब आप जानते हैं कि वहाँ जाना व्यर्थ है, तो क्यों जाते हैं? क्या आप बाहर रहकर कुछ नहीं कर सकते"

गंगुली—(हँसकर) “वही तो बात है इंदुरानी, हम खाट पर पड़ा है, हिल नहीं सकता, बात नहीं कर सकता, खा नहीं सकता; लेकिन बाबा, यमराज को देखकर हम तो उठ भागेगा, रोयेगा कि महाराज, कुछ दिन और रहने दो। हमारा जिंदगी काउंसिल में गुजर गया, अब हमको कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखाई देता।"

इंदु—"मैं तो ऐसी जिंदगी से मर जाना बेहतर समझू। कम-से-कम यह तो आशा होगी कि कदाचित् आनेवाला जीवन इससे अच्छा हो।"

गंगुली—(हँसकर) "हमको कोई कह दे कि मरकर तुम फिर इसी देश में आयेगा और फिर काउंसिल में जा सकेगा, तो हम यमराज से बोलेगा-बाबा, जल्दी कर। पर ऐसा तो कहता नहीं।"

जॉन सेवक—"मेरा विचार है कि नये चुनाव में व्यापार-भवन की ओर से खड़ा हो जाऊँ।"

गंगुली—"आप किस दल में रहेगा?"