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रंगभूमि


मिल बैठी। न जाने उसकी तकदीर में क्या है। क्लार्क से संबन्ध न होने का दुःख मुझे हमेशा रुलाता रहेगा।"

जॉन सेवक-"मैं तुमसे हजार बार कह चुका, वह किसी से विवाह न करेगी। वह दांपत्य जीवन के लिए बनाई ही नहीं गई। वह आदर्श-वादिनी है, और आदर्शवादी सदैव आनंद के स्वप्न ही देखा करता है, उसे आनंद की प्राप्ति नहीं होती। अगर कभी विवाह करेगी भी, तो कुँवर विनय सिंह से।"

मिसेज सेवक——"तुम मेरे सामने कुँवर विनयसिंह का नाम न लिया करो। क्षमा कीजिएगा रानी इंदु, मुझे ऐसे बेजोड़ और अस्वाभाविक विवाह पसंद नहीं।”

जान सेवक—"पर ऐसे बेजोड़ और अस्वाभाविक विवाह कभी-कभी हो जाते हैं।"

मिसेज सेवक—"मैं तुमसे कहे देती हूँ, और रानी इंदु, आप गवाह रहिएगा कि सोफी की शादी कभी विनयसिंह से न होगी।"

जॉन सेवक-"आपका इस विषय में क्या विचार है रानी इंदुः१ दिल की बात कहिएगा।"

इंदु-"मैं समझती हूँ, लेडी सेवक का अनुमान सत्य है। विनय को सोफो से कितना ही प्रेम हो, पर वह माताजी की इतनी उपेक्षा न करेंगे। माताजी-सी दुखी स्त्री आज संसार में न होगी। ऐसा मालूम होता है, उन्हें जीवन में अब कोई आशा ही नहीं रही। नित्य गुमसुम रहती हैं। अगर किसी ने भूलकर भी विनय का जिक्र छेड़ दिया, तो मारे क्रोध के उनकी त्योरियाँ बदल जाती हैं। अपने कमरे से विनय का चित्र उतरवा डाला है। उनके कमरे का द्वार बंद करा दिया है, न कभी आप उसमें जाती हैं, न और किसी को जाने देती हैं, और मिस सोफिया का नाम ले लेना तो उन्हें चुटकी काट लेने के बराबर है। पिताजी को भी स्वयंसेवकों की संस्था से अब कोई प्रेम नहीं रहा। जातीय कामों से उन्हें कुछ अरुचि हो गई है। अहा! आज बहुत अच्छी साइत में घर से चली थी। वह डॉक्टर गंगुली चले आ रहे हैं। कहिए, डॉक्टर साहब, शिमले से कब लौटे?"

गंगुली—“सरदी पड़ने लगी। अब वहाँ से सब कोई कूच हो गया। हम तो अभी आपकी माताजी के पास गया था। कुँवर विनयसिंह के हाल पर उनको बड़ा दुःख है।"

जॉन सेवक—"अबकी तो आपने काउंसिल में धूम मचा दी।"

गंगुली—"हाँ, अगर वहाँ भाषण करना, प्रश्न करना, बहस करना काम है, तो आप हमारा जितना बड़ाई करना चाहता है, करे; पर मैं उसे काम नहीं समझता, यह तो पानी चारना है। काम उसको कहना चाहिए, जिससे देश और जाति का कुछ उपकार हो। ऐसा तो हमने कोई काम नहीं किया। हमारा तो अब वहाँ मन नहीं लगता पहले तो सब आदमी एक नहीं होता, और कभी. हो भी गया, तो गवर्नमेंट हमारा प्रस्ताव खारिज कर देता है। हमारा मेहनत खराब हो जाता है। यह तो लड़कों का खेल है, हमको नये कानून से घड़ी आशा थो, पर तीन-चार साल उसका अनुभव करके देख लिया कि इससे कुछ नहीं होता। हम जहाँ तब था, वहीं अब भी है। मिलिटरो का खरच