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रंगभूमि


संसार में चोरों और पापियों को जनम देते हैं। यही समझ लो कि जब से मेरी चोरी हुई, कभी नींद-भर नहीं सोया। नित्य वही चिंता बनी रहती है। यही खटका लगा रहता है कि कहीं फिर न वही नौबत आ जाय। तुम तो एक हिसाब से मजे में रहे कि रुपये सब मिल गये, मैं तो कहीं का न रहा।"

भैरो—"तो तुम्हारी गवाही पक्की रही?"

ठाकुरदीन—"हाँ, एक बार नहीं, सौ बार पक्की। अरे, मेरा बस चलता, तो इसे खोदकर गाड़ देता। यों मुझसे सीधा कोई नहीं है, लेकिन दुष्टों के हक में मुझसे टेढ़ा भी कोई नहीं है। इनको सजा दिलाने के लिए मैं झूठी गवाही देने को भी तैयार हूँ। मुझे तो अचरज होता है कि इस अंधे को क्या हो गया। कहाँ तो धरम-करम का इतना बिचार, इतना परोपकार, इतना सदाचार, और कहाँ यह कुकर्म!"

भैरो यहाँ से जगधर के पास गया, जो अभी खोंचा बेचकर लौटा था और धोती लेकर नहाने आ रहा था।

भैरो—"तुम भी मेरे गवाह हो न?”

जगधर—"तुम हक-नाहक सूरे पर मुकदमा चला रहे हो। सूरा निरपराध है।"

भैरो—“कसम खाओगे?"

जगधर—"हाँ, जो कसम कहो, खा जाऊँ। तुमने सुभागी को अपने घर से निकाल दिया, सूरे ने उसे अपने घर में जगह दे दी। नहीं तो अब तक वह न जाने किस घाट लगी होती। जवान औरत है, सुंदर है, उसके सैकड़ों गाहक हैं। सूरे ने तो उसके साथ नेकी की कि उसे कहीं बहकने न दिया। अगर तुम फिर उसे घर में लाकर रखना चाहो, और वह उसे आने न दे, तुमसे लड़ने पर तैयार हो जाय, तब मैं कहूँगा कि उसका कसूर है। मैंने अपने कानों से उसे सुभागी को समझाते सुना है। वह आती ही नहीं, तो बेचारा क्या करें?"

भैरो समझ गया कि यह एक लोटे जल से प्रसन्न हो जानेवाला देवता नहीं, इसे कुछ भेंट करनी पड़ेगी। उसकी लोभी प्रकृति से वह परिचित था।

बोला—"भाई, मुआमला इजत का है। ऐसी उड़नघाइयाँ न बताओ। पड़ोसी का हक बहुत कुछ होता है; पर मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ, जो कुछ दस-बीस कहो, हाजिर है। पर गवाही तुम्हें देनी पड़ेगी।"

जगधर—“भैरो, मैं बहुत नीच हूँ, लेकिन इतना नीच नहीं कि जान-सुनकर किसी भले आदमी को बेकसूर फँसाऊँ।"

भैरो ने बिगड़कर कहा—"तो क्या तुम समझते हो कि तुम्हारे ही नाम जुदाई लिख गई है? जिस बात को सारा गाँव कहेगा, उसे एक तुम न कहोगे, तो क्या बिगड़ जायगा। टिड्डी के रोके आँधी नहीं रुक सकती।"

जगधर—"तो भाई, उसे पीसकर पी जाओ, मैं कब कहता हूँ कि मैं उसे बचा लूँगा। हाँ, मैं उसे पीसने में तुम्हारी मदद न करूँगा।"