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रंगभूमि


किसी बड़े आदमी को रोते देखकर हमें उससे स्नेह हो जाता है। उसे प्रभुत्व से मंडित देखकर हम थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं कि वह भी मनुष्य है। हम उसे साधारण मानवीय दुर्बलताओं से रहित समझते हैं। वह हमारे लिए एक कुतूहल का विषय होता है। हम समझते हैं, वह न जाने क्या खाता होगा, न जाने क्या पढ़ता होगा, न-जाने क्या सोचता होगा, उसके दिल में सदैव ऊँचे ऊँचे विचार आते होंगे, छोटी-छोटी बातों की ओर तो उसका ध्यान ही न जाता होगा-कुतूहल का परिष्कृत रूप ही आदर है। भैरो को राजा साहब के सम्मुख जाते हुए भय लगता था, लेकिन अब उसे ज्ञात हुआ कि यह भी हमी-जैसे मनुष्य हैं। मानों उसे आज एक नई बात मालूम हुई। जरा बेधड़क होकर बोला— "हजूर, है तो अंधा, लेकिन बड़ा घमंडी है। अपने आगे तो किसी को समझता ही नहीं। मुहल्लेवाले जरा सूरदास-सूरदास कह देते हैं, तो बस, फूल उठता है। समझता है, संसार में जो कुछ हूँ, मैं ही हूँ। हजूर, उसकी ऐसी सजा कर दें कि चक्की पीसते-पीसते दिन जायँ। तब उसकी सेखी किरकिरी होगी।"

राजा साहब ने त्योरी बदली। देखा, यह गँवार अब ज्यादा बहकने लगा। बोले—"अच्छा, अब जाओ।"

भैरो दिल में समझ रहा था, मैंने राजा साहब को अपनी मुट्ठी में कर लिया। अगर उसे चले जाने का हुक्म न मिला होता, तो एक क्षण में उसका 'हजूर' 'आप' हो जाता। संध्या तक उसकी बातों का तांता न टूटता। वह न जाने कितनी झूठी बातें गढ़ता। परनिंदा का मनुष्य की जिह्वा पर कभी इतना प्रभुत्व नहीं होता, जितना संपन्न पुरुषों के सम्मुख। न जाने क्यों हम उनकी कृपा-दृष्टि के इतने अभिलाषी होते हैं! हम ऐसे मनुष्यों पर भी, जिनसे हमारा लेशमात्र भी वैमनस्य नहीं है, कटाक्ष करने लगते हैं। कोई स्वार्थ की इच्छा न रखते हुए भी हम उनका सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं। उनका विश्वासपात्र बनने की हमें एक अनिवार्य आंतरिक प्रेरणा होती है। हमारी वाणी उस समय काबू से बाहर हो जाती है।

भैरो यहाँ से कुछ लजित होकर निकला, पर उसे अब इसमें संदेह न था कि मनो-कामना पूरी हो गई। घर आकर उसने बजरंगी से कहा—"तुम्हें गवाही करनी पड़ेगी। निकल न जाना।"

बजरंगी—"कैसी गवाही?"

भैरो—“यही मेरे मामले की। इस अंधे की हेकड़ी अब नहीं देखी जाती। इतने दिनों तक सबर किये बैठा रहा कि अब भी वह सुभागी को निकाल दे, उसका जहाँ जा चाहे, चली जाय, मेरी आँखों के सामने से दूर हो जाय। पर देखता हूँ, तो दिन-दिन उसकी पेंग बढ़ती ही जाती है। अंधा छैला बना जाता है। महीनों देह पर पानी नहीं पड़ता था, अब नित्य स्नान करता है। वह पानी लाती है, उसकी धोती छाँटती है, उसके सिर में तेल मलती है। यह अंधेर नहीं देखा जाता।"