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भैरो के घर से लौटकर सूरदास अपनी झोपड़ी में आकर सोचने लगा, क्या करूं कि सहसा दयागिरी आ गये और बोले -"सूरदास, आज तो लोग तुम्हारे ऊपर बहुत गरम हो रहे हैं, कहते हैं, इसे घमंड हो गया है। तुम इस माया-जाल में क्या पड़े हो, क्यों नहीं मेरे साथ कहीं तीर्थयात्रा करने चलते?”

सूरदास-“यही तो मैं भी सोच रहा हूँ। चलो, तो मैं भी निकल पड़ूँ।"

दयागिरि-"हाँ चलो, तब तक मैं भी मंदिर का कुछ ठिकाना कर लूँ। यहाँ कोई नहीं, जो मेरे पीछे यहाँ दिया-बत्ती तक कर दे, भोग-भाग लगाना तो दूर रहा।"

सूरदास-"तुम्हें मंदिर से कभी छुट्टी न मिलेगी।"

दयागिरि- "भाई, यह भी तो नहीं होता कि मंदिर को यों ही निराधार छोड़कर चला जाऊँ, फिर न जाने कब लौटूं, तब तक तो यहाँ घास जम जायगी।"

सूरदास-"तो जब तुम आप ही अभी इस माया में फंसे हुए हो, तो मेरा उद्धार क्या करोगे?"

दयागिरि-"नहीं, अब जल्दी ही चलूँगा। जरा पूजा के लिए फूल लेता आऊँ।"

दयागिरि चले गये, तो सूरदास फिर सोच में पड़ा-“संसार की भी क्या लीला है कि होम करते हाथ जलते हैं। मैं तो नेकी करने गया था, उसका यह फल मिला। मुहल्ले-वालों को बिस्वास आ गया। बुरी बातों पर लोगों को कितनी जल्द बिस्वास आ जाता है! मगर नेकी-बदी कभी छिपी नहीं रहती। कभी-न-कभी तो असली बात मालूम हो ही जायगी। हार-जीत तो जिंदगानी के साथ लगी हुई है, कभी जीतूंगा, तो कभी हारूँगा, इसकी चिंता ही क्या। अभी कल बड़े-बड़ों से जीता था, आज जीत में भी हार गया। यह तो खेल में हुआ ही करता है। अब बेचारी सुभागी कहाँ जायगी? मुहल्लेवाले तो अब उसे यहाँ रहने न देंगे, और रहेगी किसके आधार पर? कोई अपना तो हो। मैके में भी कोई नहीं है। जवान औरत अकेली कहीं रह भी नहीं सकती। जमाना ऐसा खराब आया हुआ है, उसकी आबरू कैसे बचेगी? भैरो को कितना चाहती है? समझती थी कि मैं उसे मारने गया हूँ; उसे सावधान रहने के लिए कितना जोर दे रही थी! वह तो इतना प्रेम करतो है, और भैरो का कभी मुँह ही सीधा नहीं होता, अभागिनी है और क्या। कोई दूसरा आदमी होता, तो उसके चरन धो-धोकर पीता; पर भैरो को जब देखो, उस पर तलवार ही खींचे रहता है। मैं कहीं चला गया, तो उसका कोई पुछत्तर भी न रहेगा। मुहल्ले के लोग उसकी छीछालेदर होते देखेंगे, और हँसेंगे! कहीं-न-कहीं डूब मरेगी, कहाँ तक संतोष करेगी। इस आँखोंवाले अंधे भैरो को तनिक भी खयाल नहीं कि मैं इसे निकाल दूंगा, तो कहाँ जायगी। कल को मुसलमान या किरिसतान हो जायगी, तो सारे सहर में हलचल पड़ जायगी; पर अभी उसके आदमी को