वीरपाल—"हम कानून नहीं बना सकते, पर अपनी प्राण-रक्षा तो कर सकते हैं?"
सोफी—"तुम विद्रोह करना चाहते हो और उसके कुफल का भार तुम्हारे सिर पर होगा।"
वीरपाल—"हम विद्रोही नहीं हैं, मगर यह नहीं हो सकता कि हमारा एक भाई किसी मोटर के नीचे दब जाय, चाहे वह मोटर महाराना ही का क्यों न हो, और हम मुँह न खोलें।"
सोफी—“वह संयोग था।"
वीरपाल—"सावधानी उस संयोग को टाल सकती थी। अब हम उस वक्त तक यहा से न जायँगे, जब तक हमें वचन न दिया जायगा कि भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं के लिए अपराधी को उचित दण्ड मिलेगा, चाहे वह कोई हो।"
सोफी—संयोग के लिए कोई वचन नहीं दिया जा सकता। लेकिन...”
सोफी कुछ और कहना चाहती थी कि किसी ने एक पत्थर उसकी तरफ फेका, जो उसके सिर में इतनी जोर से लगा कि वह वहीं सिर थामकर बैठ गई। यदि विनय तत्क्षण किसी ऊँचे स्थान पर खड़े होकर जनता को आश्वासन देते, तो कदाचित् उपद्रव न होता, लोग शान्त होकर चले जाते । सोफी का जख्मी हो जाना जनता का क्रोध शांत करने को काफी था। किन्तु जो पत्थर सोफी के सिर में लगा, वही कई गुने आघात के साथ विनय के हृदय में लगा। उसकी आँखों में खून उतर आया, आपे से बाहर हो गया। भीड़ को बल-पूर्वक हटाता, आदमियों को ढकेलता, कुचलता सोफी की बगल में जा पहुँचा, पिस्तौल कमर से निकाली और वीरपालसिंह पर गोली चला दी। फिर क्या था, सैनिकों को मानों हुक्म मिल गया, उन्होंने बन्दूकें छोड़नी शुरू की। कुहराम मच गया, लेकिन फिर भी कई मिनट तक लोग वहीं खड़े गोलियों का जवाब ईट-पत्थर से देते रहे। दो-चार बन्दूकें इधर से भी चलीं। वीरपाल बाल-बाल बच गया और विनय को निकट होने के कारण पहचानकर बोल—"आप भी उन्हीं में हैं!"
विनय—“हत्यारा!"
वीरपाल—"परमात्मा हमसे फिर गया है।"
विनय—"तुम्हें एक स्त्री पर हाथ उठाते लज्जा नहीं आती?"
चारों तरफ से आवाजें आने लगीं-"विनयसिंह हैं, यह कहाँ से आ गये, यह भी उधर मिल गये, इन्हीं ने तो पिस्तौल छोड़ो है!"
"बना हुआ था। घर का भेदा लंका-दाह।"
"शायद शर्त पर छोड़ गये हैं।"
"धन की लालसा सिर पर सवार है।"
"मार दो एक पत्थर, सिर फट जाय, यह भी हमारा दुश्मन है।"
"दगाबाज है।"
"इतना बड़ा आदमी और थोड़े-से धन के लिए ईमान बेच बैठा!"