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रंगभूमि


में यह बात न आयेगी। पर जथारथ में बात यही है। कासी का महातम इसीलिए है कि वह आरिया-जाति की जीती-जागती पुरातन पुरी है।"

इन महाशयों को फिर काशी की निंदा करने का साहस न हुआ। वे मन में लजित हुए और नायकराम के धार्मिक ज्ञान के कायल हो गये, हालाँकि नायकराम ने ये थोड़े-से वाक्य ऐसे ही अवसरों के लिए किसी व्याख्याता के भाषण से चुनकर रट लिये थे।

रेल के स्टेशनों पर वह जरूर उतरते और रेल के कर्मचारियों का परिचय प्राप्त करते। कोई उन्हें पान खिला देता, कोई जल-पान करा देता। सारी यात्रा समाप्त हो गई, पर वह लेटे तक नहीं, जरा भी आँख नहीं झपकी। जहाँ दो मुसाफिरों को लड़ते- झगड़ते देखते, तुरंत तीसरे बन जाते और उनमें मेल करा देते। तीसरे दिन वह उदयपुर पहुँच गये और रियासत के अधिकारियों से मिलते-जुलते, घूमते-घामते जसवंतनगर में दाखिल हुए। देखा, मिस्टर क्लार्क का डेरा पड़ा हुआ है। बाहर से आने जानेवालों की बड़ी जाँच-पड़ताल होती है, नगर का द्वार बंद-सा है, लेकिन पंडे को कौन रोकता? कस्बे में पहुँचकर सोचने लगे, विनयसिंह से क्योंकर मुलाकात हो? रात को तो धर्मशाले में ठहरे, सबेरा होते ही जेल के दारोगा के मकान पर जा पहुँचे। दारोगाजी सोफी को बिदा करके आये थे और नौकर से बिगड़ रहे थे कि तूने हुक्का क्यों नहीं भरा, इतने में बरामदे में पण्डाजी की आहट पाकर बाहर निकल आये। उन्हें देखते ही नायकराम ने गंगा-जल की शीशी निकाली और उनके सिर पर जल छिड़क दिया।

दारोगाजी ने अन्यमनस्क होकर कहा-"कहाँ से आते हो?"

नायकराम-"महाराज, अस्थान तो परागराज है; पर आ रहा हूँ बड़ी दूर से। इच्छा हुई, इधर भी जजमानों को आसीरबाद देता चलूँ।"

दारोगाजी का लड़का, जिसकी उम्र अभी चौदह-पंद्रह वर्ष की थी, निकल आया। नायकराम ने उसे नख से शिख तक बड़े ध्यान से देखा, मानों उसके दर्शनों से हार्दिक आनंद प्राप्त हो रहा है और तब दारोगाजी से बोले-“यह आपके चिरंजीव पुत्र हैं न? पिता-पुत्र की सूरत कैसी मिलती है कि दूर ही से पहचान जाय। छोटे ठाकुर साहब, क्या पढ़ते हो?"

लड़के ने कहा—"अँगरेजी पढ़ता हूँ।"

नायकराम—"यह तो मैं पहले ही समझ गया था। आजकल तो इसी बिद्या का दौरदौरा है, राजविद्या ठहरी। किस दफे में पढ़ते हो भैया?"

दारोगा-"अभी तो हाल ही में अँगरेजी शुरू की है, उस पर भी पढ़ने में मन नहीं लगाते, अभी थोड़ी ही पढ़ी है।"

लड़के ने समझा, मेरा अपमान हो रहा है। बोला-"तुमसे तो ज्यादा ही पढ़ा हूँ।"

नायकराम—'इसकी कोई चिंता नहीं, सब आ जायगा, अभी इनकी औस्था ही क्या है। भगवान की इच्छा होगी, तो कुल का नाम रोसन कर देंगे। आपके घर पर कुछ जगह-जमीन भी है?"