यह पृष्ठ प्रमाणित है।
२९८
रंगभूमि

क्लार्क—“साम्राज्य-रक्षा के सामने एक व्यक्ति के जीवन की कोई हस्ती नहीं। जिस दया से, जिस सहृदयता से किसी दीन प्राणी का पेट भरता हो, उसके शारीरिक कष्टों का निवारण होता हो, किसी दुखी जीव को सांत्वना मिलती हो, उसका मैं कायल हूँ, और मुझे गर्व है कि मैं उस संपत्ति से वंचित नहीं हूँ; लेकिन जो सहानुभूति साम्राज्य की जड़ खोखली कर दे, विद्रोहियों को सिर उठाने का अवसर दे, प्रजा में अराजकता का प्रचार करे, उसे मैं अदूरदर्शिता ही नहीं, पागलपन समझता हूँ।”

सोफी के मुख-मंडल पर एक अमानुषीय तेजस्विता की आभा दिखाई दी। पर उसने जब्त किया कदाचित् इतने धैर्य से उसने कभी काम नहीं लिया था। धर्म-परायणता को सहिष्णुता से वैर है। पर इस समय उसके मुँह से निकला हुआ एक अनर्गल शब्द भी उसके समस्त जीवन का सर्वनाश कर सकता था। नर्म होकर बोली—"हाँ, इस विचार-दृष्टि से बेशक वैयक्तिक जीवन का कोई मूल्य नहीं रहता। मेरी निगाह इस पहलू पर न गई थी। मगर फिर भी इतना कह सकती हूँ कि अगर वह मुक्त कर दिया जाय, तो फिर इस रियासत में कदम न रखेगा, और मैं यह निश्चय रूप से कह सकती हूँ कि वह अपनी बात का धनी है।"

नीलकंठ—"क्या आपसे उसने इसका वादा किया है?"

सोफी—"हाँ, वादा ही समझिए, मैं उसकी जमानत कर सकती हूँ।"

नीलकंठ—"इतना तो मैं भी कह सकता हूँ कि वह अपने वचन से फिर नहीं सकता।"

क्लार्क— "जब तक उसका लिखित प्रार्थना-पत्र मेरे सामने न आये, मैं इस विषय में कुछ नहीं कर सकता।"

नीलकंठ—"हाँ, यह तो परमावश्यक ही है।"

सोफी—“प्रार्थना-पत्र का विषय क्या होगा?"

क्लार्क—"सबसे पहले वह अपना अपराध स्वीकार करे और अपनी राज-भक्ति का विश्वास दिलाने के बाद हलफ लेकर कहे कि इस रियासत में फिर कदम न रखूँगा। उसके साथ जमानत भी होनी चाहिए। या तो नकद रुपये हों, या प्रतिष्ठित आदमियों की जमानत। तुम्हारी जमानत का मेरी दृष्टि में कितना ही महत्व हो, जाबते में उसका कुछ मूल्य नहीं।"

दावत के बाद सोफी राजभवन में आई, तो सोचने लगी—"यह समस्या क्योंकर हल हो? यों तो मैं विनय की मिन्नत-समाजत करूँ, तो वह रियासत से चले जाने पर राजी हो जायेंगे, लेकिन कदाचित् वह लिखित प्रतिज्ञा न करेंगे। अगर किसी भाँति मैंने रो-धोकर उन्हें इस बात पर भी राजी कर लिया, तो यहाँ कौन प्रतिष्ठित आदमी उनकी जमानत करेगा? हाँ, उनके घर से नकद रुपये आ सकते हैं! पर रानी साहब कमी इसे मंजूर न करेंगी। विनय को कितने ही कष्ट सहने पड़ें, उन्हें इन पर दया न