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रंगभूमि

जगधर—"इसे चाहे कंठा बनवाना या न बनवाना, इसकी बुढ़िया को एक नथ जरूर बनवा देना। पोपले मुँह पर नथ खूब खिलेगी, जैसे कोई बँदरिया नथ पहने हो।”

इस पर तीनों ने ठट्ठा मारा। संयोग से भैरो भी उसी वक्त थाने से चला आ रहा था। ठट्ठे की आवाज सुनी, तो झोपड़ी के अंदर झाँका, ये आज कैसे गुलछरें उड़ रहे हैं। यह तिगड्डम देखा, तो आँखों में खून उतर आया, जैसे किसी ने कलेजे पर गरम लोहा रख दिया हो। क्रोध से उन्मत्त हो उठा। कठोर-से-कठोर, अश्लील-से-अश्लील दुर्वचन कहे, जैसे कोई सूरमा अपनी जान बचाने के लिए अपने शस्त्रां का घातक-से-घातक प्रयोग करे-"तू कुलटा है, मेरे दुसमनों के साथ हँसती है, फाहसा कहीं की, टके-टके पर अपनी आबरू बेचती है। खबरदार, जो आज से मेरे घर में कदम रखा, खून चूस लूँगा। अगर अपनी कुशल चाहती है, तो इस अंधे से कह दे, फिर मुझे अपनी सूरत न दिखाये; नहीं तो इसको और तेरी गरदन एक हो गँड़ास से काहूँगा। मैं तो इधर-उधर मारा-मारा फिरूँ, और यह कल मुँही यारों के साथ नोक-झोंक करे! पापी अंधे को मौत भी नहीं आती कि मुहल्ला साफ हो जाता, न जाने इसके करम में क्या-क्या दुख भोगना लिखा है। सायद जेहल में चकी पीसकर मरेगा।"

यह कहता हुआ वह चला गया। सुभागी के काटो तो बदन में खून नहीं। मालूम हुआ, सिर पर बिजली गिर पड़ी। जगवर दिल में खुश हो रहा था, जैसे कोई शिकारी हरिन को तड़पते देखकर खुश हो। कैसा बौखला रहा है! लेकिन सूरदास? आह! उसकी वही दशा थी, जो किसी सती की अपना सतोत्व खो देने के पश्चात् होतो है। तीनों थोड़ी देर तक स्तंभित खड़े रहे। अंत में जगधर ने कहा-"सुभागी, अब तू कहाँ जायगी?"

सुभागी ने उसकी ओर विषाक्त नेत्रों से देखकर कहा-"अपने घर जाऊँगी! और कहाँ?"

जगधर-"बिगड़ा हुआ है, प्रान लेकर छोड़ेगा।"

सुभागी-"चाहे मारे, चाहे जिलाये, घर तो मेरा वही है।"

जगधर-“कहीं और क्यों नहीं पड़ रहतो, गुस्सा उतर जाय, तो चली जाना।"

सुभागी-"तुम्हारे घर चलती हूँ, रहने दोगे?"

जगधर—“मेरे घर! मुझसे तो वह यों हो जलता है, फिर तो खून ही कर डालेगा।"

सुभागो-"तुम्हें अपनी जान इतनी प्यारी है, तो दूसरा कौन उससे बैर मोल लेगा?"

यह कहकर सुभागी तुरंत अपने घर को ओर चली गई। सूरदास ने हाँ नहीं कुछ न कहा। उसके चले जाने के बाद जगवर बोला-"सूरे, तुम आज मेरे घर चलकर सो रहो। मुझे डर लग रहा है कि भैरो रात को कोई उपद्रव न मचाये। बदमाश आदमो है, उसका कौन ठिकाना, मार-पोट करने लगे।"