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रंगभूमि


इसी उद्विग्न दशा में करवटें बदलते-बदलते विनय की आँखें झपक गई। पहाड़ी देशों में रातें बड़ी सुहावनी होती हैं। एक ही झपकी में तड़का हो गया। मालूम नहीं, वह कब तक पड़े सोया करते; लेकिन पानी के झांसे मुँह पर पड़े, तो घबराकर उठ बैठे। बादल घिरे हुए थे और हलकी-हलकी फुहार पड़ रही थी। जसवंतनगर चलने का विचार करके उठे थे कि कई आदमियों को घोड़े भगाये अपनी तरफ आते देखा। समझे, शायद वीरपालसिंह और उनके साथी होंगे; पर समीप आये, तो मालूम हुआ कि रियासत की पुलिस के आदमी हैं। डाकिया उनके पास ही सोया हुआ था, पर उसका कहीं पता न था, वह पहले हो उठकर चला गया था।

अफसर ने पूछा—"तुम्हारा ही नाम विनयसिंह है?"

"जी हाँ।"

"कल रात को तुम्हारे साथ कई आदमियों ने यहाँ पड़ाव डाला था?"

“जी नहीं, मेरे साथ केवल यहाँ के डाकघर का एक डाकिया था।"

"तुम वीरपालसिंह को जानते हो?"

"इतना ही जानता हूँ कि वह मुझे रास्ते में मिल गया, वहाँ से कहाँ गया, यह मैं नहीं जानता।"

"तुम्हें यह मालूम था कि वह डाकू है?"

"उसने यहाँ के राजकर्मचारियों के विषय में इसी शब्द का प्रयोग किया था।"

"इसका आशय मैं यह समझता हूँ कि तुम्हें यह बात मालूम थी।"

"आप इसका जो आशय चाहें, समझें।"

“उसने यहाँ से तीन मील पर सरकारी खजाने की गाड़ी लूट ली है और एक सिपाही की हत्या कर डाली है। पुलिस को संदेह है कि यह संगीन वारदात तुम्हारे इशारे से हुई है। इसलिए हम तुम्हें गिरफ्तार करते हैं।"

"यह मेरे ऊपर घोर अन्याय है। मुझे उस डाक और हत्या की जरा भी खबर नहीं है।"

"इसका फैसला अदालत से होगा।"

"कम-से-कम मुझे इतना पूछने का अधिकार तो है कि पुलिस को मुझ पर यह संदेह करने का क्या कारण है?"

“उसी डाकिये का बयान है, जो रात को तुम्हारे साथ यहाँ सोया था।"

विनय ने विस्मित होकर कहा-“यह उसी डाकिये का बयान है!”

"हाँ, उसने घड़ी रात रहे इसकी सूचना दी। अब आपको विदित हो गया होगा कि रियासत की पुलिस आप-जैसे महाशयों से कितनी सतर्क रहती है।”

मानव—चरित्र कितना दुर्बोध और जटिल है; इसका विनय को जीवन में पहली ही बार अनुभव हुआ। इतनी श्रद्धा और भक्ति की आड़ में इतनी कुटिलता और पैशाचिकता!

दो सिपाहियों ने विनय के हाथों में हथकड़ी डाल दी, उन्हें एक घोड़े पर सवार कराया और जसवंतनगर की ओर चले।