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रंगभूमि


जीवन में शांति की इच्छा रखते हैं, प्रेम और मैत्री के लिए जान देते हैं। जिसके सिर पर नित्य नंगी तलवार लटकती हो, उसे शांति कहाँ? अंधेर तो यह है कि मुझे चुप भी नहीं रहने दिया जाता। कितना कहती थी कि मुझे इस बहस में न घसीटिए, इन काँटों में न दौड़ाइए, पर न माना। अब जो मेरे पैरों में काँटे चुभ गये, दर्द से कराहती हूँ, तो कानों पर उँगली रखते हैं। मुझे रोने को स्वाधीनता भी नहीं। 'जबर मारे और रोने न दे।' आठ दिन गुजर गये, बात भी नहीं पूछी कि मरती हो या जीती। बिलकुल उसी तरह पड़ी हूँ, जैसे कोई सराय हो। इससे तो कहीं अच्छा था कि मर जाती। सुख गया, आराम गया, पल्ले क्या पड़ा, रोना और झीकना। जब यही दशा है, तो कब तक निभेगी, 'बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी?' दोनों के दिल एक दूसरे से फिर जायगे, कोई किसी की सूरत भी न देखना चाहेगा।

शाम हो गई थी। इंदु का चित्त बहुत घबरा रहा था। उसने सोचा, जरा अम्माँ-जी के पास चलूँ कि सहसा राजा साहब सामने आकर खड़े हो गये। मुख निष्प्रभ हो रहा था, मानों घर में आग लगी हुई हो। भय-कंपित स्वर में बोले- "इंदु, मिस्टर क्लार्क मिलने आये हैं। अवश्य उसी जमीन के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करेंगे। अब मुझे क्या सलाह देती हो? मैं एक कागज लाने का बहाना करके चला आया हूँ।”

यह कहकर उन्होंने बड़े कातर नेत्रों से इंदु की ओर देखा, मानों सारे संसार की विपत्ति उन्हीं के सिर आ पड़ी हो, मानों कोई देहातो किसान पुलिस के पंजे में फँस गया हो। जरा साँस लेकर फिर बोले-'अगर मैंने इनसे विरोध किया, तो मुश्किल में फँस जाऊँगा। तुम्हें मालूम नहीं, इन अँगरेज हुक्काम के कितने अधिकार होते हैं। यों चाहूँ, तो इसे नौकर रख लूँ, मगर इसकी एक शिकायत में मेरी सारी आबरू खाक में मिल जायगी। ऊपरवाले हाकिम इसके खिलाफ मेरो एक भी न सुनेंगे। रईसों को इतनी स्वतंत्रता भी नहीं, जो एक साधारण किसान को है। हम सब इनके हाथों के खिलौने हैं, जब चाहें, जमीन पर पटककर चूर-चूर कर दें। मैं इसकी बात दुलख नहीं सकता है। मुझ पर दया करो, मुझ पर दया करो!”

इंदु ने क्षमा-भाव से देखकर कहा-"मुझसे आप क्या करने को कहते हैं?"

राजा साहब-“यही कि या तो मौन रहकर इस अत्याचार का तमाशा देखो, या मुझे अपने हाथों से थोड़ी-सी संखिया दे दो।"

राजा साहब को इस कापुरुषता और विवशता, उनके भय-विकृत मुखमंडल, दयनीय, दीनता तथा क्षमा-प्रार्थना पर इंदु करुणाद्र हो गई-इस करुणा में सहानुभूति न थी, सम्मान न था। यह वह दया थी, जो भिखारी को देखकर किसी उदार प्राणी के हृदय में उत्पन्न होती है। सोचा-हा! इस भय का भी कोई ठिकाना है! बच्चे हौआ से भी इतना न डरते होंगे। मान लिया, क्लार्क नाराज ही हो गया, तो क्या करेगा? पद से वंचित नहीं कर सकता, यह उसके सामर्थ्य के बाहर है; रियासत जन्त नहीं करा सकता, हाहाकार मच जायगा। अधिक-से-अधिक इतना कर सकता है कि अफसरों को