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रंगभूमि

जमुनी-"चुप भी रहो। लाज नहीं आती। एक लौंडा आकर सबको पछाड़ गया, यह तुम लोगों के घमण्ड की सजा है।"

ठाकुरदीन-"बहुत सच कहती हो जमुनी, यह कौतुक देखकर यही कहना पड़ता है कि भगवान को हमारे गरूर की सजा देनी थी, नहीं तो क्या ऐसे-ऐसे जोधा कठपुतलियों की भाँति खड़े रहते। भगवान किसी का घमंड नहीं रखते।"

नायकराम-"यही बात होगी भाई, मैं अपने घमंड में किसी को कुछ न समझता था।"

ये बातें करते हुए लोग नायकराम के घर आये। किसी ने आग बनाई, कोई हल्दी पीसने लगा। थोड़ी देर में मोहल्ले के और लोग आकर जमा हो गये। सबको आश्चर्य होता था कि "नायकराम जैसा फेकैत और लठैत कैसे मुँह की खा गया। कहाँ सैकड़ों के बीच से बेदाग निकल आता था, कहाँ एक लौंडे ने लथेड़ डाला। भगवान की मरजी है।"

जगधर हल्दी का लेप करता हुआ बोला-"यह सारी आग भैरो की लगाई हुई है। उसने रास्ते ही में साहब के कान भर दिये थे। मैंने तो देखा, उसकी जेब में पिस्तौल भी था।"

नायकराम-पिस्तौल और बंदूक सब देखूँँगा, अब तो लाग पड़ गई।"

ठाकुरदीन-"कोई अनुष्ठान करवा दिया जाय।"

जगधर-"अनुष्ठान का किरस्तानों पर कुछ बस नहीं चलता।"

नायकराम-"इसे बीच बाजार में फिटन रोककर मारूँगा, फिर कहीं मुँह दिखाने लायक न रहेगा। अब मन में यही ठन गई है।"

सहसा भैरो आकर खड़ा हो गया। नायकराम ने ताना दिया-"तुम्हें तो बड़ी खुसी हुई होगी भैरो!"

भैरो-"क्यों भैया?"

नायकराम-"मुझ पर मार न पड़ी है!"

भैरो-"क्या मैं तुम्हारा दुसमन हूँ भैया? मैंने तो अभी दूकान पर सुना। होस उड़ गये। साहब देखने में तो बहुत सीधा-साधा मालूम होना था। मुझसे हँस-हँसकर बातें कीं, यहाँ आकर न जाने कौन भूत उस पर सवार हो गया।"

नायकराम-"उसका भूत मैं उतार दूँँगा, अच्छी तरह उतार दूँँगा, जरा खड़ा तो होने दो। हाँ, यहाँ जो कुछ राय हो, उसकी खबर वहाँ न होने पाये नहीं तो चौकन्ना हो जायगा।"

बजरंगी-"यहाँ हमारा ऐसा कौन बैरी बैठा हुआ है?"

जगबर-"यह न कहो, घर का भेदी लंका दाहे। कौन जाने, कोई आदमो साबसी लूटने के लिए, इनाम लेने के लिए, सुर्खरू बनने के लिए, वहाँ सारी बातें लगा आये।"

भैरो-"मुझी पर शक कर रहे हो न? तो मैं इतना नीच नहीं हूँ कि घर का भेद दूसरों से खोलता फिरूँ। इस तरह चार आदमी एक जगह रहते हैं, तो आपस में खटपट