पृष्ठ:योगिराज श्रीकृष्ण.djvu/३६

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भूमिका / 35
 


पाये जाते हैं और महाभारत में भी प्राय: कृष्ण का वर्णन आता है। साधारणत: तो पुरातत्ववेत्ताओ का यह मत है कि इन पुराणों में विष्णुपुराण और महाभारत सबसे प्राचीन जान पड़ते हैं, परन्तु इनके विषय में भी यह निर्णय करना कठिन है कि इनका कौन-सा भाग पुराना और कौन-सा नया है।

प्रोफेसर विल्सन (जिन्होंने विष्णुपुराण का अंग्रेजी अनुवाद किया है) का मत है कि विष्णुपुराण में इस बात के बहुतेरे प्रमाण मौजूद हैं कि उसमें दसवी शताब्दी ईस्वी तक के वृत्तान्त पाये जाते हैं। तथापि भागवत तथा अन्य पुराणों की अपेक्षा विष्णुपुराण अधिक प्राचीन है। भागवत के विषय में तो यह विवाद चला आता है, कि कौन-सी भागवत अठारह पुराणो में गिनती करने योग्य है? श्रीमद्भागवत या देवी भागवत? वैष्णव अपनी भागवत को वास्तविक पुराण बतलाते है, और शाक्त अपनी पुस्तक को। यूरोपीय विद्वानों का मत है कि श्रीमद्भागवत तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में लिखी गई है। जो कुछ हो विद्वानों की दृष्टि में भागवत से विष्णुपुराण अधिक प्राचीन है, तथा उसमें अलंकार का मिश्रण भी कम होने से उसकी बाते अधिक विश्वसनीय मानी जाती हैं।

इसके अतिरिक्त औरों की अपेक्षा विष्णुपुराण इस योग्य है कि घटनाओं के अनुसंधान की नींव उसी पर रखी जाये। रचना-काल की दृष्टि से हरिवंश, ब्रह्मवैवर्त और ब्रह्मपुराण भी विष्णुपुराण से पश्चात् के माने जाते हैं। प्रोफेसर विल्सन की सम्मति है कि ब्रह्मवैवर्त गोकुलिए गोसाइयों की रचना है और 15वीं शताब्दी ईस्वी से पीछे की लिखी हुई है। अब रहा महाभारत सो उसके विषय में याद रखना चाहिए कि वर्तमान महाभारत असली महाभारत नहीं है। या यो कहो कि कोई यह नहीं बता सकता कि वर्तमान महाभारत में कितने श्लोक असली हैं और कितने प्रक्षिप्त अर्थात् बाद में मिलाये गए हैं। जैसे पुराणो के विषय में साधारणत: यह कहा जाता है कि वे वेदव्यास जी के बनाए हुए है वैसे ही महाभारत के विषय में भी यही कहा जाता है। परन्तु जैसा हम ऊपर कह आये है कि कम-से-कम वर्तमान पुराण व्यास के रचे हुए नहीं हैं वैसे ही हमारे पास इस बात के भी बहुत-से प्रमाण हैं कि आधुनिक महाभारत का कुल अंश व्यास जी का लिखा हुआ नहीं है। स्वयं महाभारत के आदिपर्व से प्रतीत होता है कि व्यास जी ने असल महाभारत रचकर वैशम्पायन को सुनाया, जिसने लोमहर्षण को उसकी शिक्षा दी और जिससे उसके पुत्र उग्रश्रवा ने उसे सीखा। आधुनिक महाभारत के पहले दो श्लोको में ग्रन्थकर्त्ता (जो अपना नाम नहीं प्रकट करता) लिखता है कि वह उस महाभारत को लिखता है जो उग्रश्रवा ने कुलपति शौनक के यज्ञ (बारह वर्ष के यज्ञ) में ऋषियो के सम्मुख सुनाई थी।

आदिपर्व प्रथम अध्याय के आठवें श्लोक से प्रकट होता है कि स्वयं उग्रश्रवा को भी आठ हजार श्लोक याद थे और उस समय भी यह विवाद था कि वास्तविक महाभारत कौन-से श्लोक से प्रारम्भ होता है।

आदिपर्व के निम्न श्लोक से प्रकट होता है कि व्यास जी ने असल में केवल चौबीस हजार श्लोक बनाए थे और फिर डेढ़ सौ श्लोकों में उन 24 हजार का संक्षिप्त आशव वर्णन कर