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भूमिका 33
 

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अर्थ-लोमहर्षण सूत रचयिता ने व्यास से पुराण प्राप्त किया और सूतजी उसके शिष्य हुए। लोमहर्षण सूत और दूसरों ने पुराण संहिताओं को रचा।

(4) इसकी पुष्टि भागवत पुराण के दसवें स्कन्ध के तीसरे अध्याय के श्लोकों से होती है।

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अर्थ-आरुणि, कश्यप, हारीत, अकृतव्रण, वैशम्पायन और हृतमेय ये 6 पौराणिक थे। उन्होंने मेरे पिता से पुराण सीखे जो स्वयं व्यास के शिष्य थे और मूल पुराण संहिता का अध्ययन करके उन्होंने एक-एक पुराण रचा।

(5) भागवत के 12वें स्कन्ध 7वें अध्याय के 5वें श्लोक पर टीका करते हुए पं० श्रीधर यह लिखते है :

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अर्थ-प्रथम व्यास ने संहिता लिखी और उसे मेरे पिता लोमहर्षण को सिखाया। उनसे आरुणि और दूसरों ने एक संहिता पढ़ी और उनका शिष्य मै हूँ।

इन प्रमामों से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि वर्तमान पुराणों के रचयिता के विचार में वेदव्यास की बनाई हुई पुराण संहिता वास्तव में एक ही थी और फिर उससे 6 सहिताएँ हुईं। वे 6 संहिता कौन-सी थीं और फिर उनका क्या हुआ, इसका कुछ पता नहीं चलता। मि० रमेशचन्द्रदत्त, प्रोफेसर मैक्समूलर तथा अन्य यूरोपीय पुरातत्ववेत्तागण भी इस विषय में सहमत हैं कि प्राचीन पुराणों का कुछ पता नही चलता और वे लुप्त हो गए। ऐसा प्रतीत होता है कि व्यास जी की बनाई पुराण संहिता (यदि वास्तव में व्यास जी ने कोई इस नाम की पुस्तक रची थी) तो बौद्ध के समय में नष्ट हो गई और पौराणिक समय में दन्तकथाओं अथवा अन्य लेख प्रमाणों के आधार पर वर्तमान पुराणों की रचना हुई। उस समय से आज पर्यन्त इनमें बराबर कुछ-न-कुछ काट-छाँट होती चली आई है और समय-समय पर कुछ पंडित महाशय अपने वाक्चातुर्य या बुद्धि का परिचय देने के लिए टिप्पणी के तौर पर नवीन श्लोक इनमें बढ़ाते रहे है। इन पंडितों के वंश वालो ने अपना कर्तव्य समझा कि पुराणो पर कुछ-न-कुछ अपनी बुद्धि लड़ावें और दासत्व के समय के दुर्बल विचारों के सम्मिलित करके उनको एक अनोखी खिचड़ी बना दिया। यहाँ तक कि वर्तमान पौराणिक साहित्य विविध प्रसंगों का एक ऐसा संग्रह बन गया है जिसमें से वास्तविक तथा कल्पित रचनाओं को पृथक् करना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव हो चला है। सम्भव है कि इस संग्रह में सच्ची घटनाएँ और उत्तम विचारों के मोती भी दबे पड़े हो।

परन्तु इस समय भी उनकी अवस्था ऐसी शोचनीय है कि उनमें से यथाक्रम किसी घटना