पृष्ठ:योगिराज श्रीकृष्ण.djvu/११४

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कृष्ण क दूतत्व का अन्त /115
 


फल राजा को भी भोगना पड़ता है।

"इसलिए हे राजपुत्र! तुझको उचित है कि तू अपनी मर्यादानुसार व्यवहार कर। जो आचरण तुमने ग्रहण किया है वह राजर्षियों के योग्य नहीं है। अनुचित दया की गिनती निर्बलता में होती है। तेरे पिता या मैंने कभी तेरे लिए ऐसी बुद्धि की आशा नहीं की। मैं तो सदा तेरे लिए यज्ञ, दान और पुरुषार्थ की परमेश्वर से प्रार्थना करती रही हूँ।

"मैं सदा परमात्मा से यही वन्दना करती आई हूँ कि वह तेरे आत्मा को महान् बनावे और तझे वीरता और पुरुषार्थ प्रदान करे।

"देवता जब प्रसन्न होते है तो आयुष, धन और संतान की वृद्धि करते हैं। माता-पिता की सदा यही इच्छा होती है कि उनकी संतान विद्वान् हो, दानी हो, और प्रजापालक हो। इसलिए तेरा कर्तव्य है कि जिस वर्ष में तेरा जन्म हुआ है उसके धर्म का पालन कर। हे युधिष्ठिर, दान लेना ब्राह्मण का काम है तेरा काम नहीं। तू क्षत्रिय है। तेरा धर्म है कि तू अपने बाहुबल से विपत्ति काल में दूसरों की सहायता करे। इसलिए अब विलम्ब क्यों करता है, क्यों अपने बाहुबल से अपना राजपाट नही लौटा लेता। कैसे दुख की बात है कि तुझे जन्म देकर भी मै दूसरों का दिया हुआ अन्न खाऊँ! युधिष्ठिर! तू क्यो अपने पूर्वजों के यश और कीर्ति में बट्टा लगाता है। उठ! वीरों की तरह युद्ध कर और धर्म-मर्यादा को छोड़कर भाइयों सहित पाप का भागी न बन।" इसी तरह के संदेश कुन्ती ने भीम और अर्जुन के लिए भी दिये और कृष्ण को प्यार देकर विदा किया।