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परिच्छेद]
(५५)
यमज-सहोदरा


'नवां परिच्छेद

यह सुनकर मैंने मनही मन सोचा कि अब व्यर्थ इस नरक-समान भयानक शत्रुपुरी में रहने से क्या लाभ है अतएव ममैंने कहा."प्यारी, हमीदा! यद्यपि तुम्हें छोड़कर मेरा यहाँस जाने का जी नहीं चाहता, परन्तु जब तक मैं यहांसे न जाऊंगा, तब तक तुम्हारे सिर से एक भारी बला न टलेगी, इसलिये अगर तुम मुनासिब समझो तो मुझे अफरीदी सिवाने से बाहर निकाल दो, क्योंकि मैं अब भली भांति पहाड़ी रास्ते को तय कर सकूँगा।"

हमीदा ने कहा,-. अच्छी बात है, मैं आज ही आपको यहांस निकाल दूंगी; क्योंकि जब तक मैं आपको अफरीदी सिवाने से बाहर न कर लूंगी, मेरे दिल की धड़कन दूर न होगी।"

इसी समय कुसीदा कई हथियार और एक सराही शर्बत लिये हुए आ पहुंचा और उसने आकर सुराही और हथियार हमीदा के आगे धर दिए। हमीदा ने एक तल्बार, एक बढ़ियां बंदूक और एक उत्तम बरछा मुझे दिया और एक एक आप लिया और उस सुराही में से दो तीन प्याले शर्वत मुझे पिला कर और आप भी पी कर उसने कुलीदा ले कहा,-"प्यारी, बहिन। जो कुछ मैंने तुम्हें समझाया है, उस पर बखूबी ध्यान रखना और खूब होशियारी से रहना।

इतना कह कर और उठ कर उसने एक मशाल जलाई और मुझे अपने साथ आने का इशारा कर के वह आगे हुई। वह आगे उसी रास्ते से बाहर हुई और मैं उसके पीछे। कुलीदा सबके पीछे थी। सो, उस घर के बाहर होते ही कुसीदा ने किसी ढंग से, जिसे मैं नहीं जान सका, वहांका पत्थर बराबर कर दिया। तब हमीदा ने एक ओर को उंगली उठा कर कहा,-"इस रास्ते से कुसीदा जायगी, क्योंकि यही रास्ता मेरे महल को गया है।"

इसके अनन्तर अपनी बहिन से और मुझसे सलाम बंदगी करके कुसीदा वहांसे चली गई और मैं हमीदा के साथ आगे बढ़ा।

हमीदा कहने लगी,-"यह एक सुरंग है, जिससे कोस भर तक चलने के बाद हम लोग एक घने जंगल में निकेलेंगे और वहाँ से