पृष्ठ:याक़ूती तख़्ती.djvu/३१

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परिच्छेद]
(२९)
यमज-सहोदरा


के साथ इस ओर को चली आती थी कि थोड़ीही दूर जाने पर मुझे दस बारह आदमी मिल गए, जो मेरे वालिद के नौकर थे, और मेरीही खोजके लिये भेजे गए थे। खैर, तब मैं तो दो तीन आदमियों को साथ लेकर इधर आइ और बाकी आदमियों को साथ लेकर और किसी ज़रूरी काम का बहाना करके बदज़ात अबदुल दूसरी ओर चला गया। अफ़सोस। मैं यह क्यों कर जान सकती थी कि यह हरामजादा इसी ज़रूरी काम के लिये जा रहा है! वरन मैं हर्गिज़ उसे अपनी नज़रों से दूर न करती और सुबह होने पर तुम बे खटके अपने पड़ाव पर पहुंच जाते। अफ़सोस। तुमने अबदुल के साथ जैसी नेकी की थी, उसी का एवज़ उसने इस बदी से अदा किया।"

मैंने कहा,-"निस्सन्देह, अब्दल की दुष्टता के कारण ही मैं बंदी हुआ। यह बात मैंने उसी समय समझ ली थी, जबकि उसे मैने अपनी गिरत्फारी के वक्त बड़ी मुस्तैदी के साथ मौजूद देखा था। किन्तु इसका कारण मेरी समझ में अभी तक न आया कि उस कमीने ने मेरे साथ भलाई के बदले ऐसी बुराई क्यों की?"

यह सुनतेही हमीदा का चेहरा लाल हो गया और मानो उसने किसी लज्जा के कारण अपना सिर झुका लिया हो! देर तक वह सिर झुकाए हुए कुछ सोचती रही, फिर उसने सिर उठाकर मुझसे आंखें मिलाई और इस प्रकार कहना प्रारंभ किया,-"शायद अब्दुल के इस कमीनेपन की वजह तुम नहीं जानते, लेकिन मैं इसका सबब बखूबी जानती हूं। मैं यह बात तुम पर कभी ज़ाहिर न करती, लेकिन अब उसका ज़ाहिर करनाही मैं मुनासिब समझती हूं। मैने जो तुम को अपनी मुहब्बत की निशानी वह तख्ती दी थी, शायद उसे अब्दुल ने देख और मेरी बातों को सुन लिया होगा। बस, यही वजह है कि तुम पर मेरी मुहब्बत जान कर वह कंबख्त दिलही दिल में जल भुन कर कबाब हो गया और तुम्हारी जानका गांहक बनगया। इस वक्त मैं शर्म को दूर रखकर तुमसे साफ़ कहती हूं कि यह पाजी अब्दुल मेरे इश्कमें दीवाना हो रहा है, यह बात मैं जानती हूं, लेकिन आजतक मारे खौफ़ के वह अपनी जवान से इस बारे में कुछ भी जाहिर नहीं कर सका है। मैं उसे मुतलक नहीं चाहती, लेकिन जब कि उसने तुमपर मेरी मुहब्बत देखी, तो वह जीहीजी में बहुतही कुढ़ा और जलभुन कर उसने यह बद कार्रवाई की। ऐसा करने से उसने यही