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परिच्छेद]
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यमज-सहोदरा


यह सुनकर मैं अपने मामूली कामों में लग गया और कपड़े उतार कर हाथमुंह धो और अपने पास की थोड़ी सी मेवा खाकर जलपान किया। इतने में वे सब भी अपने मामूली कामों से छुट्टी पागए और फिर मुझे पूर्ववत उस झापे में डाल तथा आंखो पर पट्टी बांध कर चलपड़े।

कई घंटे चलने के बाद वे सब फिर ठहर गए और मैं भी झांपे से निकाला गया। मेरी आंखों पर की पट्टी और हाथ पैर खोल दिए गए, तव मैंने चारों ओर देखकर समझ लिया कि मैं अफरीदियों की बस्ती में आगया हूं। जहांतक मेरी दृष्टि गई, मैंने देखा कि चारो ओर आकाश से बातें करनेवाले दुरारोह पर्वत खड़े हैं और उनके घेरे में कई कोस का लंबा चौड़ा मैदान है। घास, पात, बेत और बांस के झोपड़े जो हर एक दूसरे से बिलकुल अलग अलग थे, बने हुए हैं और उन्हीं में अफरीदी रहते हैं। मैंने देखा कि मेरे चारों ओर सैकड़ों अफरीदी नरनारी एकत्र होगए हैं और सभी मुझे अचरज की दृष्टि से देख रहे हैं। वेसब, उनलोगों से, जोकि मुझे कैद कर लेगए थे, मेरे विषय में पछपाछ रहे हैं, जिसके जवाब में वे सब भी कुछ उत्तर देरहे हैं। किन्तु उनसभों की बात चीत में इतने ग्रामीण शब्द मिले हुए थे और उनका उच्चारण इतना द्रुत था कि मैं उनकी भाषा जानने पर भी उस वार्तालाप का बहुत थोड़ा अभिप्राय समझ सकता था, सोभी शब्दद्वारा नहीं, बरन भाव द्वारा। तात्पर्य यह कि वे सब बातें मुझसे ही संबंध रखती थीं और मेरे पकड़े जाने पर सभी प्रसन्न थे।

निदान, संध्या होने से एक घंटे पहिले मैं बहुत ही लंबी चौड़ी एक पहाड़ी बारहदरी में, जोकि बहुत साफ़ और चिकनी थी, पहुंचाया गया और तब मैने जाना कि उस अफरीदी सर्दार का दर्वारगृह या कचहरी यही है। किन्तु उस समय दस बीस अफरीदी अमीर वहां पर उपस्थित थे और सर्दार मेहरखां न था। उन अमींरों से यह जान पड़ा कि कल के दरबार में मुझे हाज़िर करने के लिये सरदार ने हुक्म दिया है और आज रात भर जेलखाने की इजाजत दी है।

इसके अनन्तर वही कमीना अब्दुल मुझे कुछ दूर पर, एक पहाड़ी खोह के पास ले गया और बोला,-"तुम्हारे लिये इसी जेल का हुक्म हुआ है, चुनांचे तुम्हें आज रात भर यहीं रहना होगा।"