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पुस्तकालयका काम ठीक तरहसे चलने लगा। हिन्दीके प्रायः सभी मासिक, साप्ताहिक और दैनिक पत्र आने लगे। इस समय सभाके सदस्योंका ध्यान ज्ञानवर्धक विभागकी ओर अधिकाधिक आकर्षित होने लगा। ज्ञानवर्धक विभाग जो काम कर रहा था उतनेसे ही सभा के सदस्य सन्तुष्ट नहीं थे। इस विभाग द्वारा समाजकी सेवा करने के तरह तरहके भाव लोगोंके हृदयमें उठने लगे। कुछ लोगों को इस बातकी धुन समाई कि यदि सुलभ मूल्यपर बड़ा बजार कुमार सभा पुस्तक प्रकाशन का काम करे तो इससे समाजका भी उपकार होगा और "ज्ञानवर्धक" विभागका उद्देश्य भी चरितार्थ होगा। यह चर्चा दिनोंदिन जोर पकड़ती गई और उत्साही सभासदोंका ध्यान उस ओर अधिकाधिक आकृष्ट होने लगा। पर सभाके कोषमें इतनी पर्याप्त पूंजी नहीं थी कि वह प्रकाशनका काम सहसा उठा सकती। इसी समय सभाके एक उदार सदस्यने इस बाबत सभाकी सहायता करनेकी अभिलाषा प्रगट की। इस उद्देश्य को लेकर उन्होंने पुस्तकोंके प्रकाशनमें सभाकी सहायता करनेका वचन दिया। किसी अनिवार्य कारणवश अपना नाम नहीं प्रगट करना चाहते थे इससे यह भार उन्होंने सभाको सौंपा। सभाने इसे स्वीकार कर लिया।

अब फिर पड़ी पुस्तकोंके चुनाव की। हम लोग इस चिन्तामें थे ही कि कौन सी पुस्तक सबसे पहले निकाली जाय कि इसी बीच में मेरे मित्र अनुवादकने महात्मा गान्धीके 'यङ्ग इंडिया' के