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खिलाफतकी समस्या


अटलाण्टिक महासागरसे दुःखदायी समाचार आ रहे हैं। तुर्कों के साथ मन्धिके सम्बन्धमें मित्रराष्ट्रोंने अमरीकाके पास जो पत्र भेजा था उसके उत्तरमें अमरीकाने लिखा है:-कुस्तु. न्तूनियाके दायराके बाहर थ सका जो अंश हो उसे यनानियोंका दे दिया जाय। आँड यानोपुल, किकिलिसेह, तथा आसपासकी भूमि बलगेरियाको दे दी जाय। आर्मीनियाकी सीमा निर्धा- रित करके उसका स्वत्व भी स्वीकार कर लेना चाहिये और उस् समुद्रके मार्गकी सुविधा मिलनी चाहिये। आगे चलकर उस पत्रमें निम्नलिखित व्यवस्था की गई है कि ट्रेनिजण्ड तो आर्मेनियाको मिलना चाहिये और मसोपोटामिया, अरेबिया, पंलेस्टाइन तथा मीलिया तथा जो टापू इस समय प्रधान शक्तियोंके अधिकाग्में है, उन्हें मित्रराष्ट्रोंके हाथा सोंप दिया जाय और उन्हें उनकी व्यवस्था करनेका पूर्ण अधिकार हो । अमरीकन भार्मानियन कमोशन जिम परिणामपर पहुंचा है उसे पढ़कर नो और भी विम्मिान हा जानेमें आता है। अपनी रिपोटके अन्तमें उसने लिखा है:- "निकट पूर्वीय प्रश्नके निपटाराका एक ही तरीका है। और वह यह है कि किसी शकिक हाथमें मैंडट' दे दिया जाय और उसमें कुस्तुन्तूनिया भी शामिल कर दिया जाय ।" इन दो तारोंको पढ़कर सभी विचारवान इस बातकी प्रशंसा करेंगे कि डेपुटे- शनने अमरीका जाना निश्चितकर दूरदर्शिताका परिचय दिया हैं। सिनेटर लाज तथा अमरीकाके समाचारपत्रोंके नाम अभी- से संवाद भेजा गया है। इस पत्र में प्रार्थना की गई है कि