पृष्ठ:यंग इण्डिया.djvu/५०

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उठ खड़ा हुआ। जो लोग आज तक सरकार के विरोधी थे,सरकार की ही आंखों में खटकते थे, जिन्होंने सरकार की नीतियों.का विरोध किया था उन्हीं शिक्षित वर्ग ने पहले पहल जर्मनी के कारण उपस्थित होने वाली भयानक स्थिति को देखा। उन्होंने उस समय सारा भेद-भाव छोड़ दिया और अपनी पूरी शक्ति सरकार की सहायता में लगा दी। साम्राज्य की आवश्यकता के समय भारत ने धन जन सभी से उसकी सहायता की। विविध युद्ध-क्षेत्रों में भारत के चुने रत्नों ने अपने खून बहाये। दीन तथा दरिद्र अवस्था में रहकर भी भारतीयों ने यथासाध्य धन से भी साम्राज्य-को सहायता की। भारतीयों की इन सेवाओं की प्रशंसा की गई और बडे लाट, प्रधान मन्त्री, तथा ब्रिटनके अन्य प्रधान राजनीतिज्ञों ने इसके लिये कृतक्षता प्रकाश की। जिस समय भारत से सहायता मांगी गई थी ब्रिटिश सरकार ने जोरदार शब्दों में कहा था कि “हम इस युद्ध में केवल इसलिये प्रवृत्त हो रहे हैं कि बलवानों से दीन दुर्बलों की रक्षा हो, संसार में समता तथा स्वतन्त्रता का राज्य स्थापित हो तथा सबको मात्म निर्णय. का अधिकार मिल जाय।" इससे भारतीयों के हृदय में भी आशा की तरगें उठने लगी। उसने भी सोचा कि इस युद्ध के बाद हमारा उद्धार अवश्य हो जायगा। जिस दीन अवस्था में पड़े रहकर हम दासता को यन्त्रणायें भीगते आ रहे थे, उससे अब हम ऊपर उठाकर बराबरी के स्थान पर बैठा दिये जायंगे। साम्राउप में अब हमारा बराबरी का स्थान होगा।