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बडे लाटसे अपील ।

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( जून ३०, १९२० )


मान्यवर महोदय,

आपका मेरे ऊपर कुछ विश्वास रहा है। मैं अपनेको ब्रिटिश साम्राज्यका शुभेच्छ समझता हूं। इसलिये मैं आपके द्वारा ब्रिटिश मन्त्रिमण्डलके कानों तक विलायतके साथ अपना‌ सम्बन्ध पहुंचा देना चाहता हूं।

युद्ध के आरम्भिक कालमे जिस समय में लण्डनमें इण्डियन वालुण्टियर काप्स का सङ्गठन कर रहा था उसी समयसे मैं ग्विलाफतके प्रश्नमें दिलचस्पी लेने लगा। जिस समय तुर्कोने जर्मनीका साथ देनेकी घोषणा की मुसलमान संसारमे हलचल मच गई। जिस समय १६१५ की जनवरीमें मैं भारत पहुंचा मैंने यहांके मुसलमानोंमे भी वही चिन्ताके लक्षण पाये। जिस समय “गुप्त सन्धिकी” बात प्रगट हुई उस समय उनकी चिन्ता और भी बढ़ गई । उनके हृदयमें ब्रिटनके प्रति अविश्वासने आसन जमा लिया और उनके चारों ओर निराशाका घोर अन्धकार छा गया। उस समय भी मैंने अपने मुसलमान भाइयोंको यही सलाह दी कि वे निराश न हों बल्कि अपने भय तथा आकांक्षाओ को शान्ति पूर्वक उपस्थित करें। यह निःसङ्कोच स्वीकार