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खिलाफतकी समस्या


यह बाहर है। किसी भी प्रकार यह संभव नहीं है। यह तो निश्चय है कि भारत के मुसलमान सेना संग्रह करके अरबपर धावा न मारेंगे और उसे जीत कर सुलतान के हाथों न सौंप सकेंगे। और भारत का आन्दोलन तथा अशान्ति अंग्रेजों को मजबूर नहीं कर सकतो कि वे अरबों पर पुनः तुर्की के शासन का बोझ लाद दें। सेवा करके भारतीय मुसलमान इङ्गलैण्ड की इम्पीरियलिज्म ( साम्राज्यवाद ) का विरोध नहीं कर रहे है बल्कि वहां के उदार तथा मनुष्यप्रिय अंग्रे- जोंका अथवा वहांके उदारमतवादियोका विरोध कर रहे हैं जो भारतके लिये भो आत्मनिर्णय की योजना कर रहे हैं। थोड़ी देरके लिये मान लीजिये कि भारतके मुसलमान भीषण आन्दोलन उपस्थित करते हैं और इङ्गलैण्ड का भारतके साथ नाता टूट जाता है तो क्या इससे उनको अभीष्टकी सिद्धि हो सकती है ? क्योंकि वर्तमान अवस्थामें ब्रिटन के साथ सम्बन्ध रखकर तो वे उसकी विश्व सम्बन्धी नीतिमें कुछ न कुछ हाथ अवश्य रखते हैं। उदा. हरण के लिये तुर्कीका प्रश्न ले लीजिथे। यह स्वीकार किया जाता है कि भारतीय मुसलमानों का प्रभाव इतना अधिक नहीं पड़ा कि पलड़ा एक दम से उलट जाता। इसका कारण दूसरी ओर- की कठिनाई है। पर तोभा जी कुछ सुविधायें दी गई हैं उनका श्रेय भारतके मुसलमानों को हो है । ब्रिटनके साथ सम्बन्ध तोड़ देनेपर भारतके मुसलमानों का भारत के बाहर किसी तरहका प्रभाव नहीं पड़ सकता । संसारकी