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जेनरल डायर


कर दिया था और किसी के मुकाबिले में आनेका उसे भय नहीं था। इस प्रकारके आचरण को “समझकी भूल" नहीं कह सकते । किसी असम्भावित भयकी सम्भावना से इसे हतबुद्धि कह सकते है। यह असीम निर्दयता और पाषाण हृदयता का नमूना है। पर बेनरल डायरपर जो क्रोध प्रगट किया गया है वह सर्वथा उचित नहीं है । यह ठीक है कि गोलो चलाने में उसने भीषण वर्वरता से काम लिया। उससे बेगुनाहों की जो जाने गई उनके लिये जितना खेद प्रगट किया जाय, थोड़ा है। पर उस काण्डके बाद लोगों का धीरे-धीरे धीरे सताया जाना, अपमानित होना और निःशक्त करना उससे कहीं भीषण था, बहुत भयानक था, बहुत दुःखदायो था, बहुत ही हीनता पूर्ण था, आत्मापर आघात करनेवाला था और जिन अफसरों ने इस तरह की कार्रवाइयों में भाग लिया या सहायता दी उनको निर्भत्स्ना अथवा निन्दा जेनरल डायरसे कहीं अधिक होनी चाहिये। जेनरल डायरने तो कुछ लोगों के केवल प्राण ही लिये पर ये लोग तो एक राष्ट्र की आत्मा पर ही आघात करनेपर तुले हुए थे। करनल फ्रैक जानसन इस काण्ड का सबसे बड़ा अपराधी है। पर उसकी कोई चर्चातक नहीं करता। उसने निर्दोष लाहोरमें भय और उत्पीडन का राज्य चला दिया था और अपनी पाशविक आशासे मार्शल लाके सभी अधिकारियोंका साहस बढ़ा दिया था। पर हमें कर्नल फ्रैक जानसन के विषयमें भी उतना अधिक नहीं कहना है। पजाब निवासी तथा भारतीयोंका सर्वप्रथम और सब

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