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यंग इण्डिया


ही काम कर सकता है जितना अर्ध साप्ताहिक । अब इस बातकी सदा चेष्टा की जायगी कि इसमें उतने ही लेख रहेंगे जितने कि सप्ताह भरमें अर्ध साप्ताहिक यङ्ग इण्डियामें रहते थे।

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अभीतक यङ्ग इण्डियामें अधिकांश पञ्जाबको दुर्घटनापर ही लेख रहते थे पर यह काला बादल अब हट रहा है और हमें भी अपनो शक्ति दूसरी ओर चलाने का अवसर मिलेगा।

हमें अंग्रेजी पत्रका सम्पादन करना जरा भी रुचिकर प्रतीत नहीं होता। पर कई कारणोंसे हमें वाध्य हाकर अंग्रेजीमें ही यङ्ग इण्डिया निकालना पड़ता है । उसमेंसे प्रधान कारण तो यह है कि अभी हमारे देशके अधिकांश निवासी हिन्दी भाषासे सर्वथा अनभिज्ञ हैं, न तो अपने भावको हिन्दोके द्वाग प्रदर्शित कर सकते हैं और न दूसरोके भावको समझ ही सकते हैं। इसमें मद्रास प्रान्त तो एकदमसे पीछे है। और गौण कारण यह है कि भारत सरकार तक अपना मत पहुचानेका दूसरा कोई अन्य सहारा नहीं है। राज्य की प्रचलित भाषा अंग्रेजी है और सरकारी आलोचना जब तक अंग्रेजीमे न लिखी जाय, देखा या उसपर विचार नहीं किया जा सकता।

पर नवजीवनके प्रकाशनसे हमें नई बात मालूम हुई है। यङ्ग इण्डियाको ग्राहकसंख्या इस समय केवल १२,०० है पर नव जीवनकी ग्राहक संख्या १२,००० है और यदि कोई छापनेवाला मिल जाय तो २०,००० प्रतियां तक खा सकती हैं। इससे