पृष्ठ:यंग इण्डिया.djvu/१४४

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रतासे की गयो कि उसका पता लगाना आसान बात न थी ।बड़े शहरोंके खद्दर-भण्डारवाले सहज ही इसके फन्दे में पड़ जाते हैं क्योंकि खद्दरकी मांग ज्यादा है और उसकी पूर्ति के साधन कम हैं । यह भी एक दुःखपूर्ण अनुभव है कि बेजवाड़ा, जिसे भारत का आधुनिक ढाका नगर कहलाने की उचित ख्याति प्राप्त है, तथा उसके समीप के कुछ अप्रामाणिक बारीक पोत के वस्त्र तैयार करने वालों ने लोभ में पड़कर अपने जिलेका नाम जनता की दृष्टि में गिरा दिया । ऐसा प्रतीत होता है कि अन्य प्रान्तों की मांग पूरी करने के लिये इन लोगों ने अधिक परिमाण में विदेशी तथा भारतीय मिलों के सूत का प्रयोग किया । देशभर में जितने खद्दर भण्डार खुले हैं उनमें ऐसे भण्डारों की संख्या अधिक नहीं है जो केवल विशुद्ध खद्दर ही बेचते हों । सच तो यह है कि अब किसी विशेष कपड़े के बारे में निश्चयपूर्वक यह कह देना कि वह विशुद्ध खद्दर है असम्भव हो गया है । बिना लम्बी चौड़ी जांच के ऐसा सम्भव नहीं, जांच का परिणाम भी अधिकतर असन्तोष--- जनक होता है । कहा जाता है कि कुछ मनुष्य ऐसे प्रवीण हैं कि वे तुरन्त शुद्ध और अशुद्ध खद्दर पहिचान लेते हैं । किन्तु कपड़ा खरीदते समय उसे प्रत्येक बार उन्हें दिखला सकना असम्भव है। इस कठिनाई को दूर करने का एकमात्र उपाय यही है कि कांग्रेस की सारी शक्ति घरू उद्योगधन्धों के प्रोत्साहन में लगायी जाय और बड़े बड़े भण्डार तथा वस्त्रालय खोलकर उनमें ऐसा कपड़ा रखकर---जिनकी उत्पत्ति अज्ञात हो नगरवासि.