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मेरी आत्मकहानी
 

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इस ग्रंथ की चारो ओर प्रशंसा हुई। यहाँ तक कि इँगलैंड के वैज्ञानिक पत्रो में भी इस कृति का सुदर शब्दों में उल्लेख हुआ। मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि जिन पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी ने दार्शनिक शब्दावली के प्रस्तुत करने में इतना उन्माह और अध्यनसाय दिखाया वे ही इस ग्रंथ के परिमार्जित और सशोधित रूप में प्रकाशित होने पर सतुष्ट न हुए। उन्होंने सरस्वती पत्रिका में इसकी जो समालोचना की उसमे इस क्थन की पुष्टि हो जायगी। कदाचित् इसका कारण यह हो सकता है कि दार्शनिक शब्दावली के दोहराने में उनका सहयोग नहीं मान किया गया। इसका मुख्य कारण यह था कि जिन लोगों के हाथ में इमके दोहराने का काम दिया गया था वे सब काशी के रहनेवाले थे और यह भी इसलिये किया गया कि जिसमे परस्पर परामर्श करने में सुगमता हो। द्विवेदी जी का महीनो तक काशी में इस काम के लिये रहना असंभव था। इस एक घटना को छोडकर और कार्ड दुखद बात इस रचना के संबंध में नहीं हुई।