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मेरी आत्मकहानी
 

इसी वर्ष तीन महत्त्वपूर्ण कार्यों का भी आरम्भ हुआ। सभा ने प्रांतिक बोर्ड आब रेवेन्यू से निवेदन किया कि सन् १८८१ और १८७५ के एक्ट न० १२ और १९ के अनुसार सम्मन आदि नागरी और फारसी दोनों अक्षरों में भरे जाने चाहिएँ, पर ऐसा नहीं होता है। इस नियम का पालन होना चाहिए। जब बोर्ड से कोई उत्तर न मिला तब सभा ने गवर्नमेंट को लिखा। इसका परिणाम यह हुआ कि बोर्ड ने आज्ञा दी कि आगे से दोनो फार्म भरे जायँ, पर इस आज्ञा का भी कोई परिणाम नहीं हुआ।

इसी वर्ष सभा के पुस्तकालय की नींव पडी। खड्गविलास प्रेस तथा भारत-जीवन आदि से कुछ पुस्तकें प्राप्त हुई। इसी से नागरी-भंडार का आरंभ हुआ।

हिंदी-हस्तलिपि पर पुरस्कार देने का सभा ने पहले ही वर्ष में निश्चय किया था, पर शिक्षा विभाग से लिखापढ़ी करने में देर हुई,.इसलिये दूसरे वर्ष में इसका आरंभ हुआ।

सन् १८९४ मे मैंने पहले पहल हिंदी में एक लेख लिखा। मेरी पाठ्य पुस्तको में उस समय एक पुस्तक IIelp's Essaya written in the intervals of business थी। इसमें एक निबंध था Aids to contentment। मैंने इसके आधार पर एक लेख “संतोष” नाम से लिखा जो वाँकीपुर के एक मासिक पत्र में छपा। अब उस लेख की प्रति मेरे पास नही है और बहुत उद्योग करने पर वह अब तक प्राप्त न हो सकी।

इसी वर्ष पहले-पहल बाबू कार्तिकप्रसाद, बाबू माताप्रसाद और