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मेरी आत्मकहानी
 

विशेष उद्योग न कर सकी। मन के लड्डू खाती और आकाश-पुष्प की कामना करती थी। दरभगा के महाराज लक्ष्मीश्वरसिंह को सभा ने लिखा था कि यदि आप सहायता करें तो सभा एक हिंदी का कोश तैयार करे। महाराज ने १२५) सहायतार्य भेजकर लिया कि इस समय मैं क्यडिस्ट्रल सर्वे में फँसा हुआ हूँ। सभा काम करे, मैं फिर और सहायता देने पर विचार करूँगा। इसके पहले काँकरौली के महाराज गोस्वामी बालकृष्णलाल के यहाँ, जो उन दिनों काशी में आए हुए थे और गोपालमंदिर में ठहरे थे, हिंदी-कवियों का दरवार लगता था। एक दिन बाबू जगन्नायदास स्वाकर मुझे अपने साथ ले गए और महाराज से सहायता देने की प्रार्थना की। कई दफे दौड़ने पर १००) मिला। यह पहला दान था जो सभा को प्राप्त हुआ। उन दिनों डुमराँव के मुंशी जयप्रकाशलाल की बड़ी धूम थी। उनको बराबर एड्रेस मिलते थे और वे सबकी सहायता करते थे। बाद मे रामकृष्ण वर्मा ने संमति दी कि सभा उन्हें एड्रेस दे तो कुछ सहायता मिल सकती है। सभा तैयार हो गई। बाबू रामकृष्ण वर्म्मा, एड्रेस की पांडुलिपि तैचार की। पीछे चह विदित हुआ कि बाद मे रामकृष्ण ने मुंशी जी से ठहराव कर लिया है कि हमको इतना रुपया (कदाचिन् ५००) दो सो हम एड्रेस दिलवावें। हम लोगों को हुआ कि कहीं हम लोग कोरे ही न रह जायें इसलिये निश्चय कि गया कि एड्रेस न लिया जाय।

इसी पहले वर्ष में सभा ने हिंदी पुस्तकों की खोज का सूत्रपात किया। उसने भारत-गवर्नमेंट, संयुक्त-प्रदेश की गवर्नमेंट, पंजाब