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मेरी आत्मकहानी
 

व्यक्तियों को एक छपी चिट्ठी भेजी। अब तो बहुत से लोग क्रमश इसके सभासद बनने लगे। बाबू राधाकृष्णदास ने सभा को अमूल्य सेवा की है। पहले ही वर्ष मे सभा ने कोश, व्याकरण, हिंदीभाषा, हिंदीपत्र तथा उपन्यासों का इतिहास, यात्रा, हिंदी के विद्वानो के जीवन-चरित्र तया वैज्ञानिक ग्रंथों के लिखवाने और अन्य अनेक बातों का सूत्रपात किया, जो सब कार्य समय पाकर सफल हुए। इसका पहला वार्षिकोत्सव ३० सितबर १८९४ को कारमाइके्ल लाइब्रेरी में मनाया गया। अब तक सभा के कार्यालय का कोई स्थान न था। उसका कार्यालय मेरे ही घर पर था। यह विचार हुआ कि प्रथम वार्षिकोत्सव का सभापति किसको बनाया जाय। बाबू राधाकृष्णदास तथा बाबू कार्तिकप्रसाद ने मिलकर परामर्श किया। सोचा गया कि राजा शिवप्रसाद ने हिंदी की बड़ी सेवा की है। उन्हीं के द्वारा उसकी रक्षा हो सकी है, नहीं तो हिंदी का कहीं नाम भी न रह जाता। वे ब्रिटिश गवर्नमेंट के बड़े भक्त थे, सिक्ख-युद्ध में उन्होंने जासूसी भी की थी। पीछे वे स्कलो के इसपेक्टर बनाए गए। उन्होने विरोध को कम करने के लिये केवल नागरी अक्षरो के प्रचार के बने रहने पर जोर दिया। भाषा वे मिश्रित चाहते थे। जो हो, उस समय उनकी नीति ने बड़ा काम किया। यह सब स्मरण करके यह निश्चय किया गया कि वे ही सभापति बनाए जायें। बाबू राधाकृष्णदास, बाबू कार्तिकप्रसाद और मैं उनसे मिलने गए। उन्होंने कहा कि मैंने कलम तोड़ दी है, मेरी दावात सूख गई है, मैं अब किसी झंझट में नही पढ़ना चाहता। मुझे भूल जाइए। बाबू राधाकृष्णदास