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मेरी आत्मकहानी
 

समर्थन करना चाहते हैं। अंत में मैंने उन्हें एक पत्र लिखा, जिसकी नकल नीचे दी जाती है--

'यह बडे आनंद और संतोष की बात है कि कशिनगरि-प्रवारिणी सभा अपने जीवन का ४०वाँ वर्ष समाप्त करके ४८वे वर्ष में पदार्पण कर रही है। अब तक वह हिंदी-भाषा तथा नागरी लिपि की जा सेवा कर सकी है वह अत्यंत शलाघनीय और स्पृहणीय है। यह सफलता उन महानुभावों के आत्मत्याग निस्वार्थ सेवा का फल ही माना जायगा जिन्होंने अपने परम्परा से इसकी सेवा की है, पर अब अड़तालीसवें वर्ष से सभा एक नए मार्ग पर अग्रसर होना चाहती है, जो मुझे भविष्य के लिये अत्यंत भयावह क्या कंटका-कीर्ण जान पड़ता है। अब तक सभा का यह नियम रहा है कि उसके कार्यकर्ता नया प्रबंध समिति के सदस्य वे ही महानुभाव हो सकते हैं जिनका सभा से व्यापारिक संबंध न हो या जो वेतनभोगी न हो। व्यापारिक सबंध या वो (१) पुस्तक विक्रेताओं या प्रेसवालों से हो सकता है अथवा (२) उनसे हो सकता है, जो पारिश्रमिक लेकर सभा का साहित्यिक कार्य करते हैं। यह या दो एकमुश्त धन लेकर या रायल्टी लेकर किया जा सकता है। इन दोनों में अंतर है। एकमुश्त पारिश्रमिक लेकर काम करने का कार्य किसी एक पुस्तक तक ही सीमित है, पर रायल्टी लेकर काम करना ५०-६० वर्ष तक चलता रह सकता है। अब तक सभा ने पारिश्रमिक देकर उन सज्जनो से काम कराया है जो प्रबंध समिति के सदस्य भी रहे हैं। यद्यपि जहाँ तक मुझे ज्ञात है आज तक एक भी कार्यकर्ता ऐसा नहीं