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मेरी आत्मकहानी
 

इस प्रकार यह उद्योग निप्फल गया और मालवीय जी के कार्य- काल में किसी हिंदी के सेवक को कोई आनरेरी उपाधि न मिली। (१०) २१ जून १९३२ को मेरे चालीस वर्ष के पुराने मित्र वायू जगन्नाथदाम 'रत्नाकर' का हरिद्वार में निधन हुआ। वे बहुत दिन से बीमार थे। उनके हत्य में रोग (Dilation of the heart) हो गया था जिसके कारण उनको देह छुटी। मेरा उनका साथ बड़ा दृढ़ और घना था। वे भी मुझ पर बहुत स्नेह पति और निष्कपट भाव से मित्रता निवाहते थे। अपने सब साहित्यिक कामों में वे मेग सहयोग रखते थे। वे ब्रज-भाषा कविता के अतिम श्रेष्ठ कवि थे। उनके निधन के अनंतर मैंने सोचा कि उनकी स्मृति को बनाये रखने का कोई उपाय करना चाहिए। उन्होंने स्वय तीन हजार की निधि देकर अपने नाम से दो पुरस्कार देने का आयोजन नागरीमचारिणी सभा मे किया था। द्विवेदी जी के अमिनदन के उपरांत मेरी भावना इस प्रकार के आयोजन से बदल गई थी। मेरे विचार में इन अभिनंदनों से कोई स्थायी लाभ नहीं था। इससे कही अच्छा होता कि उनमें ग्रथो का एक उत्तम सग्रह प्रकाशित करके उनकी स्मृति को चिरस्थायी किया जाय। इसी विचार से प्रेरित होकर मैने राधाकृष्णग्रथावली को प्रकाशित करने का प्रबंध इडियन प्रेस द्वारा किया था। उसका पहला भाग छप गया है और दूसरा भाग गंगापुस्तकमाला में प्रकाशित होगा। इसी प्रकार पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी के निबधों का सग्रह मैने किया था, पर उसके प्रकाशन का कोई स्वतत्र प्रबध न हो सका तब मैने नागरीप्रचारिणी समा से उसके छापने का भार लेने के लिये प्रार्थना