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मेरी आत्मकहानी
 

कुठाराघात करना है। यदि हिंदुस्तानी का प्रचार हो गया तो देश के अन्य भागों से-बगाल, महाराष्ट्र, गुजरात आदि से–हमारा मवध विच्छिन्न हो जायगा। मेरी समझ में तो पगेन रूप से गवमेंट भी इस आंदोलन की परिपोषक है। इसको एक प्रमाण लीजिए । जब हिंदुस्तानी अकाडमी द्वारा इस हिंदुस्तानी आंदोलन ने विकट रूप धारण किया और संयुक्त-प्रदेश के शिक्षा-विभाग की रिपोर्ट में यहाँ तक लिख दिया गया कि यह अकाडमी हिंदुस्तानी के प्रचार के अपने उद्देश्य में सफल हुई तव नागरी-प्रचारिणी सभा ने सन् १९३६ में गवमेंट का ध्यान उस ओर दिलाया और पूछा कि क्या इस अकाडमी का उद्देश्य हिंदुस्तानी का प्रचार करना है। इसके उत्तर में शिक्षा-विभाग के डायरेक्टर ने लिखा-the development of a common Hindustan language is not one of the objects of the Hindustani Academy. पर यह आंदोलन शांत न हुआ और गवमेंट ने उसके रोकने का भी कोई उद्योग न किया। अब तो यह अवस्था हो रही है कि "एक तो तितलौकी दूसरे चढ़ी नीम ।' थमी तक यह अकाडमी का आंदोलन था, अब कांग्रेसी गवमेंट भी इस आंदोलन का समर्थन कर रही हैं और हिंदुस्तानी की श्रीवृद्धि में सचेष्ट होरही है। कांग्रेस हिंदू-मुस्लिम की एकता की मृग-मरीचिका के पीछे दौड़ रही है और सब कुछ त्याग कर तथा हिंदू-हितों की आहुति देकर भी उसे प्राप्त करना चाहती है। इस भ्रम का फल अच्छा नहीं होगा। हिंदू-संस्कृति पर यह सबसे बड़ा आक्रमण है। जब इसका लोग अनुभव करने लगेंगे. सष इसके