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मेरी आत्मकहानी
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अंशत. थे। उस भतीजे का भी कुछ समय उपरांत देहांत हो गया। अब दोनों हाथों से धन उड़ने लगा। सिर पर किसी प्रकार का अंकुश न होने से खूब मनमानी होने लगी । अत में जाकर सारा धन फुॅक गया, मकान बिक गया और प्रेस का सब सामान भी निकल गया। खोटी आदतें पहले ही से पड़ गई थीं। अव धन न रहने से तरह- तरह के उपायों से उसे प्राप्त करने का उद्योग किया गया। यह भी जब फुॅक गया और सिर पर ऋण का वोफ बढ़ा, तब सब तरफ से हारकर मुझे चूसने का आयोजन किया गया। मैं सदा इनकी सहायता करता रहा, पर मुझ पर ही इनके आक्रमण विशेष रूप से हुए । सन् १९२८ में बाबू रामकृष्ण वर्मा की पुत्री ने मुझ पर तथा मेरे अन्य भाइयों पर भरण-पोषण के लिये दावा किया। इस संबंध में अनेक बातें कही गई हैं जिनके लिये कोई प्रमाण या मूलाधार न था। मेरी पुस्तको की आय का हिस्सा मांगा गया, मेरे भाई के मकान पर दावा किया गया । अंत मे दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। केवल तेजाव के कारखाने पर उसका दावा सिद्ध हुआ और यह समझौता हुआ कि सब भाई तीन-तीन रुपया मासिक उसको दे । इस प्रकार जाकर सन् १९३० मे यह मुक़दमा तय हुआ । पर जहाँ लाखो की सपत्ति न बच सकी वहाँ ९ रु० महीने से क्या हो सकता था, क्योंकि मैं, रामचंद्र और बालकृष्ण ही देते थे। गौरीशंकर और मोहनलाल तो उस ओर मिले हुए थे। निदान अव मोहनलाल को अपनी भूल जान पड़ी और वे अत्यंत दीन और दुखी अवस्था में हो गए। फिर भी श्रीकृष्ण धर्मशाला से, जिसका मैं इस समय मैनिजिंग स्टीट्