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मेरी आत्मकहानी
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(३) भारतीय नाट्यशास्त्र (१९२६)

(४) गोस्वामी तुलसीदास (१९२७-२८)

(५) हिंदी-साहित्य का वीरगाथाकाल (१९२९)

(६) बालकांड का नया जन्म (आलोचना) (१९३१)

(७) चंगुप्त (आलोचना) (१९३२)

(८) देवनागरी और हिंदुस्तानी (१९३७)

इनमें सें पाँचवाँ लेख पंडित रामचंद्र शुक्ल के सहयोग से लिखा गया था।

(९) इन सब फुटकर कामों के अतिरिक्त मैंने १९१२ से मनोरजन पुस्तकमाला नाम की एक पुस्तकमाला का सपादन किया। इसमे एक आकार-प्रकार और मूल्य के १०० ग्रंथ निकालने का आयोजन किया गया। इसके प्रकाशन का भार नागरी-प्रचारिणी सभा ने लिया। यह पुस्तकमाला खूब चली। मेरे सपादकत्व मे इसमे निम्नलिखित ५० ग्रंथ प्रकाशित हुए जिनमे कई के कई संस्करण हुए तथा कुछ का दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। इस पुस्तकमाला की देखा- देखी अनेक पुस्तकमालाएं निकली और अब तक निकल रही हैं। यह आनंद की बात है कि नागरी-प्रचारिणी सभा अब पुन इस माला को जीवनदान देने में तत्पर हुई है―

(१) आदर्श जीवन―लेखक, पडित रामचन्द्र शुक्ल (१९१४)

(२) आत्मोद्धार―लेखक, बाबूरामचद्र वर्मा (१९१४)

(३) गुरु गोविंदसिंह―लेखक, बाबू वेणीप्रसाद (१९१४)