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मेरी आत्मकहानी
 

की सफाई हुई, फूलो और फलों के पेड लगवाए गए तथा बोर्डिंग हाउस बना। यह बोर्डिंग हाउस अभी बनकर तैयार नहीं हुआ था कि नैनीताल में मुशी गंगाप्रसाद वर्म्मा की अचानक मृत्यु हो गई। मुशी जी बडे साधु स्वभाव के पुरुष थे। देश की सेवा करना ही उनका व्रत था। लखनऊ नगर के सुधार में उनोने बहुत परिश्रम किया था। अमीनावाद का कायापलट उन्हीं के उद्योग का फल था। पर दुख की बात है कि वे अधिक दिन जीवित रहकर इस स्कूल की उन्नति न कर सके। उनके पीछे पडित गोकर्णनाथ मिश्र स्कूल के निरीक्षक (Member in Charge) बने और उन्हीं की देख-रेख में सब काम होता था। संयोगवश जब मैं लम्बनऊ में ही था तब मेरे व्येष्ठ तथा प्रथम पौत्र का देहांत हो गया। मुझे बड़ा दु:ख हुआ। मैंने चाहा कि एक महीने की छुट्टी लेकर कहीं बाहर जाकर मन बहला आऊॅ, पर मुशी गंगाप्रसाद के भाई वायू ईश्वरीप्रसाद की कृपा से यह छुट्टी न मिली। उन्होंने मेरे छुट्टी के आवेदन पर कुछ ऐसे कटु वाक्य कहे जिससे मुझे बड़ा दु:ख हुआ, पर कुछ आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि उनके कोई लड़का न था संतति के प्रेम का कभी उन्होंने अनुभव ही नहीं किया था। इससे उनका दूसरे के पौत्रशोक पर हँसी उडाना कोई ऐसी बात न थी कि जिस पर आश्चर्य किया जा सके। अस्तु, पंडित गोकर्णनाथ मिश्र के निरीक्षण में कार्य सुचारु रूप से चलता रहा। सन् १९२० मे जय असहयोग-आंदोलन मचा और स्कूलों से लड़को को उभाडकर निकालने का उद्योग होने लगा तब एक दिन दोपहर के बाद पंडित गोकर्णनाथ मिश्र के छोटे भाई