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मेरी आत्मकहानी
 

जाने पर विदित हुआ कि विज्ञान पढ़ाने की आज्ञा नहीं ली गई है। अब बड़ी चिंता हुई। झटपट सायंस रूम तैयार किया गया और विज्ञान पढाने का सब सामान मँगाया गया। उस समय लखनऊ में स्कूलों के इसपेक्टर मिस्टर वर्ल थे। मैं जाकर उनसे मिला और सब बातें बताई। उन्होने कहा कि विज्ञान के क्लास खोलकर तुमने ठीक काम नहीं किया। उसके स्वीकार कराने में बड़ी कठिनाई होगी। मैने कहा कि अब तो गलती हो गई, आपको उसके सुधारने में सहायता देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सायंस रूम जल्दी तैयार करायो। जब तैयार हो जाय तब मुझे सूचना देना। मैं आकर उसका निरीक्षण करूँगा और तब अपनी रिपोर्ट भेजूॅगा। यह तो उन्होंने मुझसे कहा पर प्रात काल दूसरे-तीसरे दिन आकर वे स्वयं देख जाते थे कि काम कैसे हो रहा है। जब काम पूरा हो गया जब वे स्वयं ही स्कूल के समय में निरीक्षण करने आए। सब प्रबंध देखकर उन्होंने प्रसन्नता प्रक्ट की और कहा कि मैं आज ही रिपोर्ट भेज दूँगा। मैंने निवेदन किया कि रिपोर्ट भेज देने ही से काम न चलेगा। आप इलाहाबाद-विश्वविद्यालय की सेंडिकेट की मीटिंग में स्वयं जाने का कष्ट उठावें और इस काम को पूरा करें। वे उस समय सेंडिकेट के मेवर थे। वे इलाहाबाद गए और सब काम ठीक कर आए। मिस्टर वर्ल को इस सहायता के लिये मैं बहुत कृतज्ञ हुआ। यह सब आपत्ति मेरी मूल के कारण हुई थी। मुंशी गंगाप्रसाद वर्मा भी कई बेर मिस्टर वर्ल से मिलते रहे और उन्हें सहायता करने के लिये प्रेरणा करते रहे। इस प्रकार यह काम