पृष्ठ:मेरी आत्मकहानी.djvu/१९१

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१८२
मेरी आत्मकहानी
 

उल्लंघन कर यज्ञोपवीत भी धारण करने लग गए हैं। आत्म-प्रधान और कर्म-प्रधान का झगड़ा अभी तक चल ही रहा है। यह देश कब इन झगड़ों को शांतकर उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होगा!

(७) कोश के उत्सव के साथ ही नवीन सभा-भवन के शिलान्यास का भी आयोजन किया गया और इस कार्य को सम्पन्न करना श्रद्धेय पंडित मदनमोहन मालवीय ने कृपाकर स्वीकार किया था। इस कार्य के निमित्त वे दिल्ली से काशी आए थे; पर यहाँ आने पर वे राजा मोतीचंद के यहाँ किसी यज्ञोपवीत संस्कार में सम्मिलित होने के लिये चले गये। यद्यपि सभा में इकट्ठे हुए सब लोग उनका आसरा देख रहे थे और वे भी सभा के सामने से ही गए और केवल १० मिनट तक ठहरकर इस उत्सव को सम्पन्न करने की उन्होंने कृपा न की। राजा मोतीचंद के यहाँ वे बहुत देर तक ठहरे रहे। ऐसा सुनने में आया कि एक महोदय ने उन्हें वहाँ जितनी देर तक रोकना संभव था, उतना रोका। अस्तु, जब बहुत देर हो गई तब पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा-द्वारा शिलान्यास-संस्कार कराया गया। कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ था कि मालवीय जी आ गए और बाकी कृत्य उनसे कराया गया। मुझे मालवीय जी के इस व्यवहार पर बड़ा खेद हुआ; कुछ क्रोध भी आया। पंडित रामनारायण मिश्र ने इस अवसर पर मेरी भर्त्सना की और कहा कि मेरे लिये इसका फल अच्छा न होगा, पर उनके उपदेश की उपेक्षा कर मैं सभा-भवन-से इस कृत्य के समाप्त होने के पहले ही चला गया। निश्चित सायत टल गई और भवन आज तक न बन सका।